ज़कात

{{{ जकात }}}

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नमाज़ और ज़कात का आपस में बहुत गहरा रिश्ता है, कुरआन की निगाह से देखा जाए तो नमाज़ और ज़कात ईमान के दो बाजू हैं और इन दोनों बाज़ुओ की ताक़त अल्लाह की शुक्र गुज़ारी है,

यही शुक्र गुज़ारी का जज़्बा बन्दे को नमाज़ पर उभरता है जो शुक्र ही शुक्र है, 

और यही शुक्र गुज़ारी का जज़्बा अल्लाह के लिए अपना माल खर्च करने की मांग करता है, 

कुरआन हकीम में अक्सर नमाज़ के साथ ज़कात का ज़िक्र ज़रूर होता है,

जकात का मक़सद इसके नाम ही से ज़ाहिर हो जाता है लफ्ज़ ”जकात” के मायने ‘पाक करने’ के हैं, कुरआन में अल्लाह के रसूल (स) को हुक्म हुआ था कि – इन लोगों के माल में से जकात लो इससे आप इन्हें पाकीज़ा बनाएगें और इनका तज़किया करेंगे (सूरेह तौबा 103)

इंसान में माल की मुहब्बत पैदा हो जाना एक आम बिमारी है, लेकिन जब बंदा अल्लाह के लिए अपने माल में से एक हिस्सा देता है तो उसको याद आता है कि यह माल असल में अल्लाह ही ने उसे दिया है वो खुद उसका मालिक नहीं है जिससे माल की मुहब्बत कम होती है और आखिरत का शौक भी बढ़ता है क्यों कि आख़िरत में ही उसकी जकात जमा हुई है, हज़रत ईसा (अ) की तरफ मंसूब बाइबल में यह बहुत प्यारी बात लिखी है कि- आदमी का दिल वहीँ लगा रहता है जहाँ उसका माल होता इस लिए अपना माल आसमान में जमा करो,

मुसलमान को यह बात याद रखनी चाहिए कि जब वो जकात किसी को देता है तो वो असल में किसी इंसान को नहीं बल्कि अल्लाह को दे रहा होता है, इसलिए आजिज़ी (विनम्रता) से सर झुका कर जकात दी जाए किसी पर अहसान जता कर नहीं क्यों कि अल्लाह के हुज़ूर में सिर्फ आजिज़ी (विनम्रता) से की हुई इबादत ही क़ुबूल होती है,

जकात किसे दी जाए ? यह सवाल भी बहुत अहम है और अल्लाह का शुक्र है कि उसने हमें जकात का माल किसी खास जगह पर चढ़ावा चढ़ाने या किसी खास जाति के लोगों को देने का हुक्म नहीं दिया है बल्कि ऐन फितरत के मुताबिक हमसे यह चाहा है कि हम सब से पहले अपने करीबी रिश्तेदारों और करीबी पड़ोसी में से जो भी ज़रूरत मंद है उसको दें, इससे दो फायदें हैं एक तो जकात भी अदा हो जाती है और दूसरा आपसी रिश्तों में भी मिठास बढ़ती है और रिश्ते का हक़ भी अदा हो जाता है, यह भी ज़रूरी नहीं कि आप अपने रिश्ते दार को बता कर ही दें कि यह जकात के पैसे हैं अगर आप बताएगें तो हो सकता है कि उसको बेईज्ज़ती महसूस हो, इसलिए ऐसे मामलों में आप तोहफे के तौर पर वह पैसे देदें या उधार कह कर देदें और बाद में वो क़र्ज़ माफ़ करदें, 

याद रखये अगर आप का कोई रिश्तेदार या पड़ोसी ज़रूरत मंद है तो आप की जकात पर उसी का हक है चाहे उससे आप की लड़ाई ही क्यों ना चल रही हो तब भी आप को जकात के पैसे उसे ही देने होंगे, अगर आप ने अपने करीबी ज़रूरत मंद को सिर्फ इसलिए जकात के पैसे नहीं दिए क्यों कि उसने आप को बुरा भला कहा था या उससे आपका मन मुटाव चल रहा है तो आप ने जकात का हक अदा नहीं किया और उस माल को अल्लाह का नहीं बल्कि अपना माल समझा और उसे अल्लाह की नहीं बल्कि अपनी मर्ज़ी से खर्च किया.

इस लिए जकात ज़रूर दें और उसी को दें जिसका वो हक है, और जकात की रकम को पता करने के लिए अपने किसी करीबी आलिम से अपनी सारी संपत्ति का ब्यौरा दे कर हिसाब लगवालें.

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Author: Ultimate Farhan

Adviser,writer,professional gamer,Editor

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