स्वाभिमान

स्वाभिमान की शर्त पर सम्मान हमें मंज़ूर नही,संघर्षों मे यदि कटता है तो कट जाय सारा जीवन,क़दम क़दम पर समझौता मेरे बस की बात नही।।

गरीब आदमी

मैं बहुत ही ज़्यादा गरीब आदमी था एक बार मैंने तवाफ़ करते हुए एक हार देखा जो बड़ा कीमती था। मैंने वह हार उठाया मेरा नफ़्स कह रहा था कि उसे छुपा लों- लेकिन दिल ने कहा हरगिज़ नहीं! यह तो चोरी है दीनदारी का तकाज़ा यह है कि इस हार को उसके मालिक तक पहुंचाया जाए, चुनांचे मुताफ में खड़े होकर मैंने ऐलान कर दिया अगर किसी का हार खोगया है आकर मुझसे ले जाए, एक “नाबीना” आदमी आगे आया और कहा कि यह मेरा हार है, और यह मेरी थैली से गिरा है, मेरी नफ़्स ने मुझे और मलामत कर दिया कि हार तो था भी किसी नाबीना का, इसका किसी को क्या पता चलना था छुपा लेते, मगर मैंने हार इस बुजुर्ग नाबीना को दिया वह दुआएं देता हुआ वापस चला गया। मैं अल्लाह से रोज़ रोजी की दुआ किया करता था कि अल्लाह मेरे लिए रोज़ी का इंतिज़ाम कर दें। अल्लाह की शान देखिएँ कि मैं मक्का से “हिला” आ गया यह एक शहर का नाम है, वहाँ एक मस्जिद में गया तो पता चला कि वहाँ के इमाम साहब मर गए हैं, लोगों ने मुझे कहा कि आप आगे होकर नमाज़ पढ़ा दे मैंने जब नमाज़ पढ़ाई तो लोगों को मेरी नमाज़ अच्छी लगी वह मुझे कहने लगे आप यहाँ के इमाम क्यों नही बन जाते, मैंने कहा चलें ठीक है, मैंने वहाँ इमामत के फ्राइज़ अदा करना शुरू किए, थोड़े दिनों बाद पता चला कि वफात हो गये इमाम साहब की एक जवान साल बेटी भी थी, इमाम साहब वसीयत कर गए थे कि उसकी शादी किसी नेक और अल्लाह वाले बंदे से करानी है, मुक़तदी लोगों ने कहा अगर आप चाहें हम आपका निकाह इससे करा देंगे, मैंने कहा जैसी आप लोगों की मर्जी। चुनांचे हम दोनों की शादी हो गई, शादी कुछ महीने बाद मैंने एक दिन बीवी के गले में वही हार देखा जो मैंने तवाफ़ में उस बूढ़े को वापस कर दिया था- मैंने इससे हैरानी से पूछा यह हार किस का है? और कहां से तेरे पास आया? यह हार मेरे अब्बू ने मुझे दिया था, तब मुझे इल्म हुआ कि इमाम साहब वही थे जो मैंने तवाफ़ में हार लौटाया था, मैंने बीवी से कहा कि यह हार उनसे गिर गया था और मैंने ही लौटाया था। मेरी बीवी यह सुनकर खुशी से उछल पड़ी और कहा आप दोनों की दुआएं क़ुबूल हुई है, मैंने कहा कि वह कैसे उसने कहा आपकी दुआ तो इस तरह क़ुबूल हुई कि अल्लाह ने आप को घर दिया घरवाली दी रिज़्क़ दिया, और मेरे अब्बु की दुआ इस तरह क़ुबूल हुई जब वह वापस आये तो मेरे लिए दुआ की कि या अल्लाह जिस अमीन इंसान ने मेरा हार लौटाकर मुझे दिया इस तरह के नोजवान का रिश्ता मेरी बेटी के लिए भेज दे, यू अल्लाह ने आप दोनों की दुआ क़ुबूल की। महलस इंसान का काम अल्लाह कभी रुकने नहीं देता अटकने नहीं देता। अल्लाह तआला ऐसे लोगों की कश्ती हमेशा किनारे लगा लेता है।

नसीहत

एक बुज़ुर्ग इंसान से मुलाक़ात हुई तो मैंने गुज़ारिश की.. कि जिंदगी की कोई नसीहत दीजिये मुझे….

उन्होंने अज़ीब सवाल किया कि कभी बर्तन धोये हैं?

मैं उनके सवाल पर हैरान हुआ और सर झुका कर कहा कि.. जी धोये हैं।

पूछने लगे..क्या सीखा??

मैंने कोई जवाब नही दिया…

*वो मुस्कुराये और कहने लगे…

“बर्तन को बाहर से कम और अंदर से ज्यादा धोना पड़ता है….. 

बस यही जिंदगी है।

​मजदूर की आत्मकथा

मैं मजदूर हूँ। एक श्रमिक। मजदूरी करना ही मेरा धर्म है। मैं हिन्दू, मुस्लमान या ईसाई नहीं। मेरी पहचान है ‘श्रम’, मेरा कर्म है मजदूरी। मैं गरीब के घर पैदा हुआ, अभावों में पला बड़ा हुआ और अपनी किस्मत से लड़ता मजदूरी कर रहा हूँ। मेरा न तो कोई भविष्य है, न कोई बचपन, न जवानी! मैं कभी बिस्तर पर नहीं सोया। मैं मिट्टी में खेल कर बड़ा हुआ। मैं कभी विद्यालय नहीं गया। अंगूठा छाप हूँ मैं।
मजदूर का कोई नाम नहीं होता। पुल बने या घर, कारखाने में काम करूँ या खेत में, मुझे मजदूरी मिलती है। दैनिक मजदूरी। जिस दिन काम पर नहीं जाऊँगा, मैं और मेरे घरवाले भूखे सोयेंगे। पूरे परिवार के साथ मैं कार्यस्थल पर चला जाता हूँ। मेरी पत्नी भी मजदूरी करती है और बच्चे अन्य मजदूरों के बच्चों के साथ खेलते रहते हैं।

मौसम का हम पर कोई असर नहीं पड़ता। सर्दी हो, गर्मी हो या बरसात हम कोल्हू के बैल की तरह जुटे रहते हैं। हम अन्न उत्पादन करते हैं और भूखे सोते हैं। घर बनाते हैं, इमारतें बनाते हैं और आकाश के तले खुले में सोते हैं। कपड़े की मिलों में काम करते हैं और हमारे परिवार के पास तन ढँकने को कपड़े नहीं होते।

हम पशु के समान हैं। हमें दुत्कार कर और मार कर काम लिया जाता है। हमारा शोषण किया जाता है। कभी कभी तो काम करने के बाद भी पैसे नहीं मिलते। हमारा परिवार बीवी बच्चे इलाज के बिना मर जाते हैं। हमारे बच्चे बड़े लोगों को देख कर आहें भरते हैं।

हम भी चाहते हैं कि हमारे बच्चे स्वच्छ वातावरण में रहें, स्कूल जायें और साफ कपड़े पहनें। बीमार होने पर हमारा इलाज हो और हमारे पास भी इलाज के पैसे हों। हम किसी से बराबरी नहीं करना चाहते, किन्तु दिन रात पत्थर तोड़ने, बोझा ढोने और मेहनत के बाद हमें इतनी मजदूरी तो मिलनी ही चाहिये कि हम इज्जत की जिन्दगी जी सकें। पेट भर खा सकें।