मुहम्मद बिन क़ासिम(Mohammad Bin Kasim)

मध्यकालीन भारत 

लगभग 632 ई. में ‘हज़रत मुहम्मद’ की मृत्यु के उपरान्त 6 वर्षों के अन्दर ही उनके उत्तराधिकारियों ने सीरिया, मिस्र, उत्तरी अफ़्रीका, स्पेन एवं ईरान को जीत लिया। इस समय ख़लीफ़ा साम्राज्य फ़्राँस के लायर नामक स्थान से लेकर आक्सस एवं काबुल नदी तक फैल गया था। उन्होंने जल एवं थल दोनों मार्गों का उपयोग करते हुए भारत पर अनेक धावे बोले, पर 712 ई. तक उन्हें कोई महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हुई। मध्यकालीन भारत में यही वह समय था, जब भारत में सूफ़ी आन्दोलन की शुरुआत हुई।

भारत पर अरबों का आक्रमण

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अपनी सफलताओं के जोश से भरे हुए अरबों ने अब सिंध पर आक्रमण करना शुरू किया। सिंध पर अरबों के आक्रमण के पीछे का कारण था के अरब के व्यापारी लोग भारत और दूसरे पूर्वी राज्यों की मंडी में कारोबार करने आते थे। लेकिन अक्सर ही उनका माल से भरा हुआ जहाज़ सिंध के तटीय इलाक़ों में समंदरी लुटेरों के दुआरा लूट लिया जाता था। 8 बेसकीमती जहाज़ लूट लिए गए

हज्जाज बिन युसूफ ने कई बार राजा दाहिर को इस बारे में लिखा लेकिन राजा दाहिर ने ये कहके के ये समुंद्री लुटेरे उसके राज्य की सीमाओं से बहार रहते हैं इन लुटेरों पर कोई भी कार्यवाई करने से इनकार कर दिया।

ये रवय्या ऐसा ही था जैसे की आज पाकिस्तान कश्मीर में होने वाले आतंकवाद को रोकने में अपनी असमर्थता ये कहकर जाता देता है के वो कश्मीर में आने वाले आतंकवादियों को रोकने में सामर्थ्य नहीं है हालांकि पाकिस्तान चाहे तो दो दिन में कश्मीरी आतंकवादियों के सारे कैम्पों को बंद करवा सकता है।

एक बार कुछ ऐसा हुआ के समुंद्री लुटेरों ने जब एक अरब जहाज़ को लूट तो एक मुस्लिम औरत को राजा दाहिर को उपहार स्वरुप दे दिया। समुंद्री लुटेरे लूट का माल और क़ैद किये गए ग़ुलाम अक्सर राजा दाहिर को खुश रखने के लिए उसे दे दिया करते थे।

इस मुस्लिम औरत ने हज्जाज बिन युसूफ को चिठ्ठी लिखी जिसमे उसने हज्जाज बिन युसूफ से मदद मांगी. हज्जाज बिन युसूफ की सेना ने दो बार राजा दाहिर पर हमला किया लेकिन पंजाब के इलाक़े पर क़ब्ज़ा न कर सके.

आख़िरकार हज्जाज बिन युसूफ ने ये काम अपने भतीजे मुहम्मद बिन क़ासिम को दिया. मुहम्मद बिन क़ासिम ने 711 ईस्वी में भारत के हिन्दू राजा दाहिर पर हमला कर दिया.

17 वर्ष की अवस्था में सिंध के अभियान का सफल नेतृत्व किया। उन्होंने देवल, नेरून, सिविस्तान जैसे कुछ महत्त्वपूर्ण दुर्गों को अपने अधिकार में कर लिया, इस जीत के बाद मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध, बहमनाबाद, आलोद आदि स्थानों को जीतते हुए मध्य प्रदेश की ओर प्रस्थान किया।

मुहम्मद बिन कासिम के फ़तेह किये हुए 

राज्य (711-715 ई.)

#देवल_विजय

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एक बड़ी सेना लेकर मुहम्मद बिन कासिम ने 711 ई. में देवल पर आक्रमण कर दिया। दाहिर ने अपनी अदूरदर्शिता का परिचय देते हुए देवल की रक्षा नहीं की और पश्चिमी किनारों को छोड़कर पूर्वी किनारों से बचाव की लड़ाई प्रारम्भ कर दी। दाहिर के भतीजे ने राजपूतों से मिलकर क़िले की रक्षा करने का प्रयास किया, किन्तु असफल रहा और मुहम्मद बिन कासिम ने यहा फ़तेह का झंडा बुलंद कर दिया

#नेऊन_विजय

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नेऊन पाकिस्तान में वर्तमान हैदराबाद के दक्षिण में स्थित चराक के समीप था। देवल के बाद मुहम्मद कासिम नेऊन की ओर बढे दाहिर ने नेऊन की रक्षा का दायित्व एक पुरोहित को सौंप कर अपने बेटे जयसिंह को ब्राह्मणाबाद बुला लिया। नेऊन में बौद्धों की संख्या अधिक थी। उन्होंने मुहम्मद बिन कासिम के सामने बिना युद्ध किये ही हथियार डाल दिए उन्होंने मुहम्मद बिन कासिम का स्वागत किया। इस प्रकार बिना युद्ध किए ही मीर क़ासिम का नेऊन दुर्ग पर अधिकार हो गया।

#सेहवान_विजय

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नेऊन के बाद मुहम्मद बिना कासिम सेहवान (सिविस्तान) की ओर बढ़ा। इस समय वहाँ का शासक माझरा था। इसने भी मुहम्मद बिन कासिम की बहादुरी और कारनामो को देखते हुए बिना युद्ध किए ही नगर छोड़ दिया और बिना किसी कठिनाई के सेहवान पर मुहम्मद बिन कासिम का अधिकार हो गया।

#सीसम_के_जाटों_पर_विजय

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सेहवान के बाद मुहम्मद बिन कासिम ने सीसम के जाटों पर अपना अगला आक्रमण किया। बाझरा यहीं पर मार डाला गया। जाटों ने भी अपने घुटने टेक दिए और मुहम्मद बिन कासिम की अधीनता स्वीकार कर ली।

#राओर_विजय

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सीसम विजय के बाद कासिम राओर की ओर चल दिए दाहिर और मुहम्मद बिन कासिम की सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ। इसी युद्ध में दाहिर मारा गया। दाहिर के बेटे जयसिंह ने राओर दुर्ग की रक्षा का दायित्व अपनी विधवा माँ पर छोड़कर ब्राह्मणाबाद चला गया।

लड़ाई का जोश और जीत की चमक आँखों में लिए इस नोजवान की सेना के सामने 

दुर्ग की रक्षा करने में अपने आप कोअसफल पाकर दाहिर की विधवा पत्नी ने आत्मदाह कर लिया। इसके बाद कासिम का राओर पर नियंत्रण स्थापित हो गया।

#ब्राह्मणाबाद_पर_विजय

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ब्राह्मणाबाद की सुरक्षा का दायित्व दाहिर के पुत्र जयसिंह के ऊपर था। उसको भी कासिम के आक्रमण के सामने मुह की खानी पड़ी

#आलोर _विजय

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ब्राह्मणाबाद पर अधिकार के बाद कासिम आलोर पहोंचे। प्रारम्भ में आलोर के निवासियों ने कासिम का सामना किया, किन्तु अन्त में विवश होकर आत्मसमर्पण कर दिया

#मुल्तान_विजय

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आलोर पर विजय प्राप्त करने के बाद कासिम ने मुल्तान की तरफ कूच को यहाँ पर आन्तरिक कलह के कारण कासिम को सहायता मिली जिस की वजह से आसानी से मुल्तान फतह कर लिया मोहम्मद बिन कासिम का नगर पर अधिकार हो गया। इस नगर से मीर क़ासिम को इतना माल ऐ गनीमत मिला की, उन्होंने इसे ‘स्वर्णनगर’ नाम दिया।

714 ई. में हज्जाज की और 715 ई में ख़लीफ़ा की मृत्यु के उपरान्त मुहम्मद बिन कासिम को वापस बुला लिया गया। अरब की राजनीतिक स्थिति सामान्य न होने के कारण दाहिर ने अपने पुत्र जयसिंह को बहमनाबाद पर पुनः क़ब्ज़ा करने के लिए भेजा, परन्तु सिंध के राज्यपाल जुनैद ने जयसिंह को हरा कर बंदी बना लिया। कालान्तर में कई बार जुनैद ने भारत के आन्तरिक भागों को जीतने हेतु सेनाऐं भेजी, परन्तु नागभट्ट प्रथम, पुलकेशी प्रथम एवं यशोवर्मन (चालुक्य) के सामने जीत ना मिल सकी और पीछे हटना पड़ा इस प्रकार मुहम्मद बिन कासिम को वापसी की वजह से अरबियों का शासन भारत में सिंध प्रांत तक सिमट कर रह गया। कालान्तर में उन्हें सिंध का भी त्याग करना पड़ा।

मगर यहाँ से भारत में इस्लाम का सूर्य उदय होना सुरु हो चूका था उस 17 साल के नो जवान ना बालिग

मुहम्मद बिन क़ासिम के अख़लाक़ और इखलास की वजह से उसके एक मज़लूम औरत की फरियाद पे उस की हिफाज़त के लिए किये गए सफ़र में सिंध से मुलतान तक 1 लाख लोगो ने कलमा पढ़ लिया था

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हिजाब(Hijab)

कुछ साल पहले की बात है हमारे दोस्त की बहन दिल्ली यूनीवर्सिटी में पढ़ती थी। उनकी माली हालत इतनी ठीक नही थी कि पढाई का बोझ उठा सके इसलिए उनकी बहन ने ट्युशन पढ़ा कर पढाई का खर्च निकालना शुरू किया। उनके पास गली के ही 10-15 बच्चे आते थे जैसे तैसे करके वो अपनी पढाई का खर्च निकाल लेती थी। उनमे एक बदलाव आया कि जब वो स्कूल में थी तब बुर्का नहीं पहनती थी पर जब कॉलेज में आई तो उन्होंने बुर्का पहनना शुरू कर दिया था। हालांकि उनके घर का माहौल इस्लामिक नही था फिर भी उन्होंने बुर्का पहनना शुरू कर दिया था। कॉलेज खत्म होने के बाद उन्होंने एक बार बताया कि उन्होंने बुर्का पहनना क्यूँ शुरू किया था और उसकी असल वजह थी कि उनके पास ज्यादा कपडे नहीं थे कि पढाई के साथ महंगे कपडे खरीद सके तो उन्होंने मटिया महल से एक बुर्का खरीद लिया ताकि कपड़ों पर पैसे जाया न हो और पढाई करते वक़्त पुराने कपड़ों की वजह से साथ पढने वाले बच्चों के बीच एहसास ए कमतरी का शिकार न हो। उन्होंने पूरी कॉलेज एक बुर्के पहन कर गुजार दी और बुर्के की वजह से कॉलेज के लफंगे भी तमीज से पेश आते हैं। अब वो अपने खाविंद के साथ विदेश में है और उनकी एक डेड साल की बेटी भी है। असल में पोस्ट इसलिए लिखी कि दो दिन से बुर्के पर बहस हो रही थी तो मैंने भी सोचा कि मैं ये किस्सा आपसे शेयर कर दूं ताकि ये पता लगे कि बुर्के पहनने से एक लड़की को कितना फायदा हुआ। असल में बुर्का सामजिक समानता का प्रतिक है और ऐसे समाज की बुनियाद डालता है जो दिखावे और बाहरी आडम्बर से परे हो। जहाँ एक दुसरे की बीवियों को देखकर आदमी की अपनी मोहतरमा में दिलचस्पी कम न हो। और न अपनी मोहतरमा में किसी दुसरे की दिलचस्पी पैदा हो। वो ऐसा समाज हो जहाँ कपड़ों और गहनों की वजह से आर्थिक असमानता उत्पन्न न हो। जहाँ कोई गरीब और सस्ते कपडे की वजह से एहसास ए कमतरी का शिकार न हो ।जिस समाज में खुलापन ज्यादा है वहां दिखावा भी ज्यादा है उनकी पूरी ज़िन्दगी क्या पहनना है और कितना खुदको सजाना है ताकि आगे वाले को कायल कर सके पर टिकी है इसकी वजह से समाज में एक अनदेखा मानसिक तनाव उत्पन्न हो गया है। और उस मानसिक तनाव को दूर करने के लिए इंसान शराब से लेकर जिना के अड्डो पर सुकून तलाश रहा है। पर ये भी हकीकत है कि मुस्लिम नौजवान औरतों के मामले में इस्लाम की दलीलें लाकर रख देते हैं पर वही नौजवान इस्लाम ने औरतों को क्या हुकूक दिए हैं इस पर कम ही बात करते हैं।

गर्मियों की एक तपती दोपहर 

बहुत ही प्यारा वाकया ज़रूर पढ़ें

वह गर्मियों की एक तपती दोपहर थी। ऑफिस से मैं छुट्टी ली हुई थी क्योंकि घर के कुछ जरूरी काम निपटाने थे। बच्चों को कंप्यूटर पर गेम खेलना सिखा रहा था कि बाहर बेल बजी। काफी देर के बाद दूसरा बैल हुई तो मैं जाकर दरवाजा खोला। सामने मेरी ही उम्र के एक साहब खड़े थे।

“… अस्सला वालैकुम ….!”

उन्होंने बेहद अच्छे तरीके से हाल चाल पुछा। पहले तो मेरे मन में ख्याल आया यह कोई चंदा आदि लेने वाले हैं। उनके चेहरे पर दाढ़ी खूब सज रही थी, और कपड़े से वह चंदा मांगने वाले हरगिज़ नहीं लग रहे थे।

“जी फरमाये, मैंने पूछा।

“आप ताहिर साहब हैं?”

” जी ” मैं मुख़्तसर जवाब दिया।

“वे मुझे रफीक साहब ने भेजा है। शायद आपको किराएदार की जरूरत है।”

हाँ हाँ …!

“मुझे अचानक याद आया कि मैंने ऑफिस के एक साथी को बताया था कि मैं अपने घर का ऊपर वाला हिस्सा किराए पर देना चाहता हूँ अगर कोई नेक और छोटा परिवार उसकी नज़र में हो तो बताए। क्योंकि कार्यालय वेतन खर्च पूरे नहीं होते। मुझे दुख हुआ कि मैं इतनी धूप में काफी देर इसे बाहर खड़ा रखा। ”

इसे छह महीने के लिए मकान किराए पर चाहिए था। क्योंकि अपना मकान गिराकर दुबारा तामीर करवा रहे थे। मैं तीन हजार किराया बताया। लेकिन बात दो हजार से पक्की हो गई।

वह चला गया तो मुझे अफसोस होने लगा कि किराया कुछ कम है। जबकि ऊपर केवल एक छोटा सा कमरा, रसोई और बाथरूम था।

मुझे अपनी पत्नी की तरफ से डर लगा था कि उसे पता होगा तो कितना झगड़ा होगा। और वही हुआ। बकौल उसके दो हजार तो केवल बच्चों की फीस है। मुझे उसने काफी बुरा भला कहा और चुपचाप सुनता रहा, और अपनी किस्मत को कोसते रहा 

मैं एमएससी में बहुत ज़्यादा नंबर से किया था। इसलिए तुरंत नौकरी मिल गई, नौकरी मिली तो शादी भी तुरंत हो गई।

मेरी पत्नी भी बहुत पढ़ी लिखी थी। वह भी एक अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाती थी, हमारे तीन बच्चे थे। मगर खर्चा बहुत मुश्किल से चलता था।

अगले ही दिन वह साहब और उनकी पत्नी बच्चे हमारे घर पे आ गए। उनकी पत्नी ने पूरी शरई पर्दा क्या हुआ था। दोनों बड़े बच्चे बहुत ही सभ्य और सुंदर थे। छोटा गोद में था।

कुछ दिनों बाद एक दिन में ऑफिस से आया तो मेरी पत्नी ने बताया कि मैं बच्चों को किराएदार महिला से कुरान पढ़ने के लिए भेज दिया है। अच्छा पढ़ाती हैं, अपने बच्चे इतनी सुंदर किरात करते हैं।

कुछ दिन बाद जब मैं उनके एक बेटे से किरात सुनी तो पहली बार मेरे मन में इच्छा उभरी कि काश हमारे बच्चे भी इतना अच्छा कुरान पढ़ें।

एक दिन में बाहर जाने लगा तो अपनी पत्नी से पूछ ही लिया कि वह पार्लर जाएगी तो लेता चलूं। क्योंकि पहले तो दो महीने में तीन चार बार पार्लर जाती थी और इस महीने में एक बार भी नहीं गई थी।

उसने जवाब दिया कि पार्लर फिजूलखर्ची है। जितनी रौनक चेहरे पर पांच बार वुज़ू करने, नमाज़ और तिलावत से आती है किसी चीज़ से नहीं आती। अगर ज्यादा जरूरत हो तो घरेलू उपयोग की वस्तुओं से ही चेहरे पर निखार रहता है।

एक दिन में केबल पर ड्रामा देख रहा था तो मेरे छोटे बेटे ने मुझे बिना पूछे टीवी बंद कर दिया और मेरे पास आकर बैठ गया।

“बाबा यह बेकार काम है। मैं आपको अपने नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का एक वाकया सुनाऊं।”

मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन अपने बेटे की ज़बानी जब वाकया सुना तो मेरा दिल भर आया।

“यह तुम्हें किसने बताया,” मैंने पूछा।

“हमारी उस्तानी … वह कुरान पढ़ाने के बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और सहाबा के बारे में बताती हैं।”

अपने घर और पत्नी बच्चों के तेजी से बदलते हालत देख कर हैरान हो रहा था कि एक दिन पत्नी ने कहा कि केबल कटवा दें। कोई नहीं देखता और वैसे भी फिजूलखर्ची और ऊपर से गुनाह है।

कुछ दिन बाद पत्नी ने खरीदारी पर जाने को कहा तो मैं फ़ौरन तैयार हो गया, वह काफी दिनों बाद खरीदारी का कहा था वरना पहले तो आए दिन बाजार जाना रहता था।

“क्या खरीदना है?” मैंने पूछा।

” बुर्का ….. !! ”

क्या ??

मैं हंसा तो वह बोली,

” पहले कितने ही गैर शरई काम करती थी, आपने कभी मजाक नहीं उड़ाया था, अब अच्छा काम करना चाहती हूं तो आप मजाक सूझ रहा है। ”

कुछ न बोला।

फिर कुछ दिन बाद उसने मुझे काफी सारे पैसे दिए और कहा फ्रिज की बाकी कीमत अदा कर दें। ताकि अधिक किश्तें न देनी पड़े।

“इतने रुपए की बचत कैसे हो गई?”

“बस हो गया”, वह मुस्कुराई

“जब इंसान अल्लाह के बताए हुए हुक्मों पर चलने लगे तो बरकत खुद बखुद हो जाती है.यह भी वे किराएदार महिला ने बताया है ”

सकून मेरे अंदर तक फैल गया.मेरी पत्नी अब न मुझे कभी लड़ी, न शिकायत की। बच्चों को वे घर में पढ़ा देती है। खुद बच्चों के साथ कुरान तजविद से पढ़ना सीख रही थी, वह खुद नमाज़ पढ़ने लगी थी, और बच्चों को सख्ती से नमाज़ पढ़ने लिए भेजती थी।

मुझे एहसास होने लगा कि निजात का रास्ता यही तो है। पैसा और सजावटी आराम नहीं है। सकून तो बस अल्लाह की याद में है।

मुझे उस दिन दो हजार किराया थोड़ा लग रहा था, आज सोचता हूँ तो लगता है कि वह तो इतना अधिक था कि आज मेरा घर सकून से भर गया है।

एक सेकंड लगेगा शेयर करने में शेयर करदें ताकि कोई नसीहत हासिल करले 

जज़ाक अल्लाह

Ramadan

​Ninth month of the Islamic Calendar.

Meaning:

Derived from “RAMADHA”, literally means “intense heat”.  The possible reasons for this meaning:

1. When the Islamic months were enforced the month of fasting coincided with the summer months of intense heat.

2. The second reason which has been mentioned is that due to fasting the temperature within the stomach increases, again the element of heat is a factor behind the actual naming of RAMADAN.

3. It has also been said that “RAMADHAA” is one of the names of Allah Ta’aalaa.  If that is the case then the month has acquired the name due to the fact that Allah Ta’aalaa burns away accumulated sins and eliminates then from the list of unlawful deeds.  Once again the burning sins cannonades “HEAT”.  However. it should be acknowledged that this reasoning is not wholly reliable.

Blessings:

Hadhrat Salmaan (R.A) reports that on the last day of Sha’baan the Messenger of Allah Ta’aalaa addressed then and said, “Oh people, there comes before you now a great month, a most blessed month in which lies a night more greater in virtue than 1,000 months; (LAYLATUL-QADR).  It is a month in which each day should be observed by fasting, this has been made obligatory by the Almighty Allah.”

Events:

1. Hadhrat Hasan (R.A.), Holy Prophet grandson was born on 15th of Ramadan, three years after Hijrah.

2. Qur’an was revealed on the 27th night of Ramadan from the “Lauhe Mahfooz” (on 7th heaven) to 1st heaven.

3. The first Battle in the Islamic History, “BATTLE OF BADR” took place on the 12th of Ramadan in year 2 A.H.

4. Victory of Makkah took place on 18th of Ramadan in the year 8 A.H.

5. Hadhrat Sawdah (R.A) was married in year 10 A.H. to the Holy Prophet 

6. Hadhrat Zainab Bint Khuzaima’s (R.A.) marriage took place in the year 3 A.H. to the Holy Prophet .

7. Deaths:

i)  Hadhrat Ruqayyah (R.A),  Holy Prophet  daughter, passed away at the young age of 23 in the year 2 A.H when the Prophet  was at “Battle of Badr”.

ii)  Hadhrat Khadijah (R.A), wife of the Holy prophet   departed from this world on the 11th of Ramadan in the year 10 A.H.

iii)  Hadrat Fatimah (R.A) took leave from the world on a Tuesday 3rd Ramadan in the year 11 A.H. (6 months after the death of Holy Prophet  she was only 29 years old.)

iv)  Hadrat Abbas (R.A.) the Holy Prophet  uncle passed away on a Friday  12th Ramadan in the year 32 A.H at the age of 88

v)  Hadrat Ali (R.A.) the Prophet  son-in-law departed from this world on Friday 27th Ramadan, age 57 in the year 40 A.H.

vi)  Hadhrat Saffiyah (R.A.) took leave from this world in the year 50 A.H., aged 60 years.

vii) Hadhrat Aa’ishah (R.A.) was 65 years old when she departed in the year 58 A.H.

​रोज़ा 

#रोज़ा

सिर्फ भूखे प्यासे रहना ही रोज़ा नही है रोज़ा पुरे शरीर का होता है

आँख,कान नाक,हाथ पैर और सबसे बड़ा #नफ्ज़ पे काबू पाना यानि इच्छाओ पे काबू पाना

भूखे प्यासे रह कर उन ग़रीब इंसानो का दर्द महसूस होता है जिन्हें दो वक़्त की रोटी नसीब नही

जब आप मुकम्मल रोज़ा रखते है तो आपसे एक भी #गुनाह गलत काम नही होंगें

आपके अपने घर में भले ही पकवान भरे हो कोई देखने टोकने वाला भी नही फिर भी आप उसे नही खाते तो आप #नफ़्स में काबू रखना सीख जाते है

जब आप एक महीने लगातार नफ्ज़ में काबू पाने का प्रयत्न करते है तो आप काफ़ी हद तक कामयाब होते है और चोरी,ज़िनाकारी बलात्कार, बेईमानी आदि तरह की बुराई से बच जाते है,तमाम मुस्लिम रोज़े के बाद भी इसी दिन चर्या में जीते है

और रोज़े का यही मक़सद है

रोज़े में दिखावे से बचे

ज़कात एक नई सोच के साथ

ज़कात का ऐसे भी भुगतान किया जा सकता है।

मान लीजिए कि आप जिस समाज में रहते हैं इसमें सौ (100) घर गरीबों के हैं और आप हर साल एक लाख रुपये ज़कात अदा करते हैं।

आप ज़कात दो तरह से भुगतान कर सकते हैं।

एक यह कि आप सौ घरों को हजार हजार रुपये दे दें। 

अापकी ज़कात तो अदा हो जाएगी लेकिन अगले साल भी यही सौ घर अापकी ज़कात की प्रतीक्षा में रहेंगे क्योंकि आपके हजार रुपये उनकी समय पर जरूरत तो पूरी कर दी थी लेकिन साल बीतते बीतते यह जरूरत भी लौट आई। इस तरह आप दस साल क्या पचास साल भी ज़कात अदा करते रहें तो आपके समाज से गरीबी का खात्मा नहीं हो पाएगा।

दूसरा तरीका यह है कि आप एक लाख की ज़कात को दस हजार के हिसाब से केवल दस घरों को दें और वह भी इस तरह दें कि वे इन पैसों से खुद अपने पैरों पर खड़े हो जाएं। 

यानी वह उन पैसों से स्थायी आय के लिए कोई व्यवसाय कर लें। तो अगले साल आपके समाज से दस गरीब घर कम हो जाएंगे और आने वाले दस साल में पूरे समाज से गरीबी कआ खात्मा हो जाएगा।

हमारा उद्देश्य केवल ज़कात देना न हो बल्कि इस तरह देना हो कि *आज का ज़कात लेने वाला कल का ज़कात देने वाला बन जाए।*

अब फैसला आपको करना है कि आपको केवल ज़कात अदा करनी है या फिर ज़कात अदा करने के साथ गरीबी खात्मा भी करना है