गर्मियों की एक तपती दोपहर 

बहुत ही प्यारा वाकया ज़रूर पढ़ें

वह गर्मियों की एक तपती दोपहर थी। ऑफिस से मैं छुट्टी ली हुई थी क्योंकि घर के कुछ जरूरी काम निपटाने थे। बच्चों को कंप्यूटर पर गेम खेलना सिखा रहा था कि बाहर बेल बजी। काफी देर के बाद दूसरा बैल हुई तो मैं जाकर दरवाजा खोला। सामने मेरी ही उम्र के एक साहब खड़े थे।

“… अस्सला वालैकुम ….!”

उन्होंने बेहद अच्छे तरीके से हाल चाल पुछा। पहले तो मेरे मन में ख्याल आया यह कोई चंदा आदि लेने वाले हैं। उनके चेहरे पर दाढ़ी खूब सज रही थी, और कपड़े से वह चंदा मांगने वाले हरगिज़ नहीं लग रहे थे।

“जी फरमाये, मैंने पूछा।

“आप ताहिर साहब हैं?”

” जी ” मैं मुख़्तसर जवाब दिया।

“वे मुझे रफीक साहब ने भेजा है। शायद आपको किराएदार की जरूरत है।”

हाँ हाँ …!

“मुझे अचानक याद आया कि मैंने ऑफिस के एक साथी को बताया था कि मैं अपने घर का ऊपर वाला हिस्सा किराए पर देना चाहता हूँ अगर कोई नेक और छोटा परिवार उसकी नज़र में हो तो बताए। क्योंकि कार्यालय वेतन खर्च पूरे नहीं होते। मुझे दुख हुआ कि मैं इतनी धूप में काफी देर इसे बाहर खड़ा रखा। ”

इसे छह महीने के लिए मकान किराए पर चाहिए था। क्योंकि अपना मकान गिराकर दुबारा तामीर करवा रहे थे। मैं तीन हजार किराया बताया। लेकिन बात दो हजार से पक्की हो गई।

वह चला गया तो मुझे अफसोस होने लगा कि किराया कुछ कम है। जबकि ऊपर केवल एक छोटा सा कमरा, रसोई और बाथरूम था।

मुझे अपनी पत्नी की तरफ से डर लगा था कि उसे पता होगा तो कितना झगड़ा होगा। और वही हुआ। बकौल उसके दो हजार तो केवल बच्चों की फीस है। मुझे उसने काफी बुरा भला कहा और चुपचाप सुनता रहा, और अपनी किस्मत को कोसते रहा 

मैं एमएससी में बहुत ज़्यादा नंबर से किया था। इसलिए तुरंत नौकरी मिल गई, नौकरी मिली तो शादी भी तुरंत हो गई।

मेरी पत्नी भी बहुत पढ़ी लिखी थी। वह भी एक अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाती थी, हमारे तीन बच्चे थे। मगर खर्चा बहुत मुश्किल से चलता था।

अगले ही दिन वह साहब और उनकी पत्नी बच्चे हमारे घर पे आ गए। उनकी पत्नी ने पूरी शरई पर्दा क्या हुआ था। दोनों बड़े बच्चे बहुत ही सभ्य और सुंदर थे। छोटा गोद में था।

कुछ दिनों बाद एक दिन में ऑफिस से आया तो मेरी पत्नी ने बताया कि मैं बच्चों को किराएदार महिला से कुरान पढ़ने के लिए भेज दिया है। अच्छा पढ़ाती हैं, अपने बच्चे इतनी सुंदर किरात करते हैं।

कुछ दिन बाद जब मैं उनके एक बेटे से किरात सुनी तो पहली बार मेरे मन में इच्छा उभरी कि काश हमारे बच्चे भी इतना अच्छा कुरान पढ़ें।

एक दिन में बाहर जाने लगा तो अपनी पत्नी से पूछ ही लिया कि वह पार्लर जाएगी तो लेता चलूं। क्योंकि पहले तो दो महीने में तीन चार बार पार्लर जाती थी और इस महीने में एक बार भी नहीं गई थी।

उसने जवाब दिया कि पार्लर फिजूलखर्ची है। जितनी रौनक चेहरे पर पांच बार वुज़ू करने, नमाज़ और तिलावत से आती है किसी चीज़ से नहीं आती। अगर ज्यादा जरूरत हो तो घरेलू उपयोग की वस्तुओं से ही चेहरे पर निखार रहता है।

एक दिन में केबल पर ड्रामा देख रहा था तो मेरे छोटे बेटे ने मुझे बिना पूछे टीवी बंद कर दिया और मेरे पास आकर बैठ गया।

“बाबा यह बेकार काम है। मैं आपको अपने नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का एक वाकया सुनाऊं।”

मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन अपने बेटे की ज़बानी जब वाकया सुना तो मेरा दिल भर आया।

“यह तुम्हें किसने बताया,” मैंने पूछा।

“हमारी उस्तानी … वह कुरान पढ़ाने के बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और सहाबा के बारे में बताती हैं।”

अपने घर और पत्नी बच्चों के तेजी से बदलते हालत देख कर हैरान हो रहा था कि एक दिन पत्नी ने कहा कि केबल कटवा दें। कोई नहीं देखता और वैसे भी फिजूलखर्ची और ऊपर से गुनाह है।

कुछ दिन बाद पत्नी ने खरीदारी पर जाने को कहा तो मैं फ़ौरन तैयार हो गया, वह काफी दिनों बाद खरीदारी का कहा था वरना पहले तो आए दिन बाजार जाना रहता था।

“क्या खरीदना है?” मैंने पूछा।

” बुर्का ….. !! ”

क्या ??

मैं हंसा तो वह बोली,

” पहले कितने ही गैर शरई काम करती थी, आपने कभी मजाक नहीं उड़ाया था, अब अच्छा काम करना चाहती हूं तो आप मजाक सूझ रहा है। ”

कुछ न बोला।

फिर कुछ दिन बाद उसने मुझे काफी सारे पैसे दिए और कहा फ्रिज की बाकी कीमत अदा कर दें। ताकि अधिक किश्तें न देनी पड़े।

“इतने रुपए की बचत कैसे हो गई?”

“बस हो गया”, वह मुस्कुराई

“जब इंसान अल्लाह के बताए हुए हुक्मों पर चलने लगे तो बरकत खुद बखुद हो जाती है.यह भी वे किराएदार महिला ने बताया है ”

सकून मेरे अंदर तक फैल गया.मेरी पत्नी अब न मुझे कभी लड़ी, न शिकायत की। बच्चों को वे घर में पढ़ा देती है। खुद बच्चों के साथ कुरान तजविद से पढ़ना सीख रही थी, वह खुद नमाज़ पढ़ने लगी थी, और बच्चों को सख्ती से नमाज़ पढ़ने लिए भेजती थी।

मुझे एहसास होने लगा कि निजात का रास्ता यही तो है। पैसा और सजावटी आराम नहीं है। सकून तो बस अल्लाह की याद में है।

मुझे उस दिन दो हजार किराया थोड़ा लग रहा था, आज सोचता हूँ तो लगता है कि वह तो इतना अधिक था कि आज मेरा घर सकून से भर गया है।

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जज़ाक अल्लाह

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रम​ज़ान के क्या मायने हैं ? रमज़ान के महीने में पड़ने वाले 29 या 30 रोज़े के मायने क्या केवल इंसान को भूखा और प्यासा रखना है ?

दरअसल यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्युँकि कुछ नास्तिक  “रमज़ान” के महीने में 45° तापमान पर इंसान को 15 घंटे 30 दिन भूखे प्यासे रहने को इंसानों पर अल्लाह का अत्याचार बता रहे हैं।

मुझे उम्मीद है कि वह खुद रोज़े नहीं रखते होंगे और अपने इस धार्मिक दायित्व को पूरा ना करने की मानसिक कुंठा को संतुष्ट करने के लिए यह ऐसे ऊल जुलूल तर्क और भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। खैर

आईए समझते हैं कि “रमज़ान के मायने” क्या हैं और रोज़ा दरअसल है क्या ?

क्या केवल भूखा प्यासा रहना ही रोज़ा है ?

नहीं , दरअसल केवल भूखा और प्यासा रहना “फाक़ा” अर्थात “व्यर्थ उपवास” करना मात्र है इससे अधिक कुछ नहीं। रोज़ा एक संपुर्णता को समेटे हुए शब्द है जिसको सभी को समझना बेहद आवश्यक है।

क़ुरआन कहता है कि दुनिया इंसान के लिए एक परीक्षा स्थल है। इंसान की ज़िन्दगी का उद्देश्य ईश्वर की इबादत (उपासना) है। (क़ुरआन, 51:56)

इबादत का अर्थ क्या है ? ईश्वर केन्द्रित जीवन (God-centred life) व्यतीत करना है , इबादत एक पार्ट-टाइम नहीं, बल्कि फुल टाइम अमल है , जो पैदाइश से लेकर मौत तक जारी रहता है।

यह अनिवार्य अर्थात रोज़े फर्ज़ हैं , जो केवल रमज़ान के महीने में रखे जाते हैं और यह हर व्यस्क मुसलमान के लिए अनिवार्य हैं।

क़ुरआन में कहा गया है—

अल-कुरान:- ‘‘ऐ ईमान लाने वालो! तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुम से पहले के लोगों पर किए गए थे, शायद कि तुम डर रखने वाले और परहेज़गार बन जाओ।’’ – (क़ुरआन, 2:183)

अल-कुरान :- रमज़ान का महीना जिसमें क़ुरआन उतारा गया लोगों के मार्गदर्शन के लिए, और मार्गदर्शन और सत्य-असत्य के अन्तर के प्रमाणों के साथ। अतः तुममें जो कोई इस महीने में मौजूद हो, उसे चाहिए कि उसके रोज़े रखे और जो बीमार हो या यात्रा में हो तो दूसरे दिनों से गिनती पूरी कर ले। ईश्वर तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, वह तुम्हारे साथ सख़्ती और कठिनाई नहीं चाहता और चाहता है कि तुम संख्या पूरी कर लो और जो सीधा मार्ग तुम्हें दिखाया गया है, उस पर ईश्वर की बड़ाई प्रकट करो और ताकि तुम कृतज्ञ बनो।’’ – (क़ुरआन, 2:185)

अब समझिए कि “रोज़ा” क्या है

रोज़ा भी एक इबादत है ।

रोज़े को अरबी भाषा में ‘‘सौम’’ कहते हैं। इसका अर्थ ‘‘रुकने और चुप रहने’’ हैं। क़ुरआन में इसे ‘‘सब्र’’ भी कहा गया है, जिसका अर्थ है ‘स्वयं पर नियंत्रण’ और स्थिरता व जमाव (Stability)।

इसका ख़ुलासा ज़ब्ते नफ़स, साबित क़दमी और इख़्लास है।

• ज़ब्ते नफस :- अर्थात शरीर की समस्त इंद्रियों पर नियंत्रण करना।

• साबित क़दमी :- अर्थात अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना।

• इख़्लास :- अर्थात ईमानदारी और निष्ठा

“ज़ब्ते नफस” सबसे महत्वपूर्ण है।

शरीर की समस्त इंद्रियों पर नियंत्रण “रोज़े” का एक महत्वपूर्ण अंश है।

इंद्रियाँ कैसे नियंत्रित होंगी ?

जैसे रोज़ा रहने वाले के मन में कोई भी गलत , अनैतिक , ऐय्याशी , छद्म , झूठ , मक्कारी , चुगली , लड़ाई लड़ाना , दूषित अथवा किसी को भी बिना किसी उचित कारण के आर्थिक , सामाजिक और शारीरिक चोट पहुँचाने का ध्यान भी आया तो उसे तुरंत मन से ही निकाल देना या ऐसे विचार आने ही ना देना दरअसल “रोज़ा” है।

किसी महिला के प्रति गलत भाव आया या उसे देख कर या सोचकर मन और शरीर में उत्तेजना या बुरे ख्याल आए उसे तुरंत रोक देना ही नहीं बल्कि किसी भी महिला को इस नजर से देखने से खुद को रोकना ही दरअसल “रोज़ा” है।

चोरी , डकैती , धोखा देना या किसी को बेवजह कष्ट पहुँचाना और कष्ट पहुँचाने का सोचने को खुद को रोक देना या ऐसे ही वह तमाम बुरे काम जो मनमस्तिष्क में आते हैं उनको आने से रोकना ही दरअसल “रोज़ा” है।

चोरी , डकैती , धोखा देना या किसी को बेवजह कष्ट पहुँचाना और कष्ट पहुँचाने का सोचने को खुद को रोक देना या ऐसे ही वह तमाम बुरे काम जो मनमस्तिष्क में आते हैं उनको आने से रोकना ही दरअसल “रोज़ा” है।

सोचिएगा कि इन कामों को करना फिर कितना बुरा होगा कितना बड़ा प्रतिबंध होगा जबकि इनके सोचने पर ही रोज़े में प्रतिबंध है।

रोज़ा दरअसल पेट और मुँह के साथ साथ कान , आँख , और वाणी के साथ साथ हृदय और मन में भी गलत बात ना आए उसका एक प्रयास है तो अपनी शारीरिक इच्छाओं को नियंत्रित करना भी रोज़ा है। जिसका जितना अधिक प्रयास सफल होगा रोज़ा उतना अधिक सफल होगा।

“साबित क़दम” से तात्पर्य यह है कि इस्लाम और कुरान के बताए सभी आदर्शों पर अडिग होकर अमल करना और खुद के अन्दर की बुराइयों से जद्दोजहद करना ही दरअसल जेहाद है , और रमजान महीने में यह जेहाद करना ही दरअसल “रोज़ा” है।

“इख़्लास” अर्थात ईमानदारी और निष्ठा जो कि इस्लाम कामूलभूत सिद्धांत है , इसपर अडिग होकर अमल करना ही दरअसल रोज़ा है।

बात समझिए कि सिर्फ़ भूखा प्यासा रहना ही रोज़ा नहीं है। रोज़ा की संपुर्णता में उपरोक्त तीनों का ईमानदारी और निष्ठा से अमल करना आवश्यक है , रोज़े की संपुर्णता तभी होगी।

इस से ज़ाहिर होता है कि इस्लाम धर्म के समीप “रोज़ा” का मतलब यह है कि आदमी अपनी इंद्रियों के हवा व हवस और नाजायज़ इच्छाओं में बहक कर ग़लत राह पर ना पड़े और अपने अन्दर मौजूद ज़ब्त और साबित क़दमी के तेवर को बर्बाद होने से बचाऐ।

दिन प्रतिदिन के जो कार्य होते हैं उनमें तीन विषय ऐसे होते हैं, जो इन्सान की पाक आदतों को बर्बाद कर के उसे “हवा व हवस” का पुजारी बना देती है।

अर्थात खाना, पीना और औरत मर्द (पति-पत्नी) के बीच शारीरिक सम्बंध। इन्हीं को काबू में रखने और एक तय समय में उन से दूर रहने का दरअसल नाम भी “रोज़ा” है।

इस्लाम में मुसलमान का अल्लाह की इबादत की नीयत से सुर्योदय से लेकर सुर्यास्त तक अपने आप को जानबूझकर खाने, पीने और पत्नी-पत्नी का शारीरिक संबंध से खुद को बचाए रखने का दरअसल नाम भी “रोज़ा” है।

औरतों को मासिक धर्म और प्रसव के समय में रोज़ा ना रखने की छूट है।

शेष , नमाज़ , ज़कात इत्यादि तो फर्ज़ हैं ही जो रमज़ान के महीने में संपुर्ण करने की कोशिशें की जाती हैं।

सोचिएगा कि 30 दिन ऐसा जीवन व्यतीत करके कोई कितना नेक और पवित्र हो सकता है , सोचिएगा कि खुद के अन्दर की बुराइयों से 30 दिन लड़कर कोई 31 वें दिन वह इसी स्वभाव में रहना चाहेगा ? कुछ लोगों को बिगड़ते बिगड़ते कुछ दिन तो लगेंगे ही और कुछ लोग यही जीवन अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके आगे भी जीते रहेंगे और कुछ लोग यदि डगमगाए तो 11 महीने बाद फिर से रमज़ान उनको सुधारने के लिए आ जाएगा।

कुल मिलाकर एक वाक्य में रमजान किसी व्यक्ति के संस्कार और व्यवहार को उच्च स्तर पर ले जाने का एक महीना है , कुरान की यह वह व्यवस्था है जो बड़े से बड़े धनाढ्य और शहंशाह तथा बादशाहों को गरीब भूखे प्यासे की गरीबी उनकी भूख उनकी प्यास साल के हर महीने में महसूस करने को मजबूर करती है।

सोचो कि 45-50° के तापमान की भूख प्यास हो , बरसात हो या माईनस ज़ीरो डिग्री में गरीबों का भूखा प्यासा रहना , क्या बीतती है उनपर यह खुद महसूस करो , क्युँकि खुद महसूस करोगे तो उनके दर्द और तकलीफ का एहसास होगा , तो उनपर ज़कात निकाल कर खर्च करोगे।

छद्म नास्तिकों को यह समझ में नहीं आएगा।सभी लोगों से गुजारिश है

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#अन_छुए_पहलु

Divorce in Islam(तलाक)

Nature demands that men and women lead their lives together. The ideal way of leading such a life is, according to the shari‘ah, within the bonds of marriage. In Islam, marriage is both a civil contract entered into by mutual consent of the bride and groom, and a highly sacred bond to which great religious and social importance is attached.
However, in the knowledge that an excess of legal constraints can lead to rebellion, such injunctions have been kept to a realistic minimum and have been formulated to be consistent with normal human capabilities. Moreover, their enforcement is less relied upon than the religious conditioning of the individual to ensure the maintenance of high ethical standards and appropriate conduct in marital affairs and family life.
The state of marriage not only lays the foundations for family life, but also provides a training ground for individuals to make a positive adjustment to society. When a man and woman prove to be a good husband and a good wife, they will certainly prove to be good citizens in the broad spectrum of their social group. This has been aptly expressed in a Hadith: “The best of you is one who is best for his family.” Ibn Majah, Sunan, Kitab an-Nikah, 1/636
The family being the preliminary unit for the training of human beings, its disintegration has an injurious effect on the society to which those human beings must individually make a positive contribution, if collectively they are to form a good and just nation. If the family no longer exists, it is the whole of humanity, which suffers.
Once a man and a woman are tied together in the bonds of matrimony, they are expected to do their utmost, till the day they die to honor and uphold what the Qur’an calls their firm contract, or pledge. (Qur’an, 4:21) To this end, the full thrust of the Shariah is leveled at preventing the occurrence of divorce; the laws it lays down in this regard exist primarily, therefore, as checks, not incentives.
Islam regards marriage as an extremely desirable institution, hence its conception of marriage as the rule of life, and divorce only as an exception to that rule. According to a Hadith, the Prophet Muhammad said, “Marriage is one of my Sunnah (way). One who does not follow it does not belong to me.” Ibn Majah, Sunan, Kitab an-Nikah.
When a mail and a woman live together as husband and wife, it is but natural that they should have their differences, it being a biological and psychological fact that each man and each woman born into this world are by their very nature quite different from each other. That is why the sole method of having unity in this world is to live unitedly in spite of differences. This can be achieved only through patience and tolerance; virtues advocated by the Prophet not only in a general sense, but, more importantly, in the particular context of married life. Without these qualities, there can be no stability in the bond of marriage. According to Abu Hurayrah, the Prophet said, “No believing man should bear any grudge against a believing woman. If one of her ways is not to his liking, there must be many things about her that would please him. “Muslim, Sahih, Kitab ar-Rada’, 2/1091
It is an accepted fact that everyone has his strengths and his weaknesses, his plus points and his minus points. This is equally true of husbands and wives. In the marital situation, the best policy is for each partner to concentrate on the plus points of the other, while ignoring the minus points. If a husband and wife can see the value of this maxim and consciously adopt it as the main guiding principle in their lives, they will have a far better chance of their marriage remaining stable.

However, it sometimes happens, with or without reason, that unpleasantness crops up, and goes on increasing between husband and wife, with no apparent indication of their being able to smooth things out by themselves. Their thinking about each other in a way that is conditioned by their maladjustment prevents them from arriving at a just settlement of their differences, based on facts rather than on opinions. In such a case, the best strategy according to the Qur’an is to introduce a third party who will act as an arbiter. Not having any previous association with the matters under dispute, he will remain dispassionate and will be able to arrive at an objective decision acceptable to both parties.
For any arbiter to be successful, however, the husband and wife must also adopt the correct attitude. Here is an incident from the period of the four pious Caliphs, which will illustrate this point.
When ‘Ali ibn Abi Talib reigned as fourth Caliph, a married couple complaining of marital discord came to him to request a settlement. In the light of the above-mentioned Qur’anic guidance ‘Ali ordered that a board of arbiters, one from the husband’s family and one from the wife’s family, be set up, which should make proper enquiries into the circumstances and then give its verdict. This verdict was to be accepted without argument by both sides.
As recorded in the book, Jami’ al-Bayan, by at-Tabari, the woman said that she gave her consent, on the book of God, whether the verdict was for or against her. But the man protested that he would not accept the verdict if it was for separation. ‘Ali said, “What you say is improper. By God, you cannot move from here until you have shown your willingness to accept the verdict of the arbiters in the same spirit as the woman has shown.”
This makes it clear that a true believer should wholeheartedly accept the arbiters and their verdict in accordance with the Qur’anic injunctions. Once their verdict is given, there should be no further dispute.

Two Ways of Divorcing

However, it has to be conceded that life does not always function smoothly, like a machine. Despite all safeguards, it sometimes does happen that a couple reaches a stage of such desperation that they become intent on separation. Here the Shariah gives them guidance in that it prescribes a specific method for separation. The Qur’an expresses it thus: “Divorce may be pronounced twice, then a woman must be retained in honor or allowed to go with kindness.” Qur’an, 2:229
This verse has been interpreted to mean that a man who has twice given notice of divorce over a period of two months should remember God before giving notice a third time. Then he should either keep his spouse with him in a spirit of goodwill, or he should release her without doing her any injustice.
This method of divorce prescribed by the Qur’an, i.e. taking three months to finalize it, makes it impossible for a man seeking divorce suddenly to cast his wife aside. Once he has said to his wife (who should not at this time be menstruating), “I divorce you,” both are expected to think the situation over for a whole month. If the man has a change of opinion during this period, he can withdraw his words. If not, he will again say, “I divorce you,” (again his wife should be in a state of “purity”) and they must again review the situation for a further month. Even at this stage, the husband has the right to revoke the proceedings if he has had a change of heart. If, however, in the third month, he says,“I divorce you,” the divorce becomes final and the man ceases to have any right to revoke it. Now he is obliged to part with his wife in a spirit of good will, and give her full rights.

This prescribed method of divorce has ensured that it is a well-considered, planned arrangement and not just a rash step taken in a fit of emotion. When we remember that in most cases, divorce is the result of a fit of anger, we realize that the prescribed method places a tremendous curb on divorce. It takes into account the fact that anger never lasts — tempers necessarily cool down after some time-¬and that those who feel like divorcing their wives in a fit of anger will certainly repent their emotional outburst and will wish to withdraw from the position it has put them in. It also takes into account the fact that divorce is a not a simple matter: it amounts to the breaking up of the home and destroying the children’s future. It is only when tempers have cooled down that the dire consequences of divorce are realized, and the necessity to revoke the decision becomes clear.

When a man marries a woman, he has to say only once that he accepts her as his spouse. But for divorce, the Qur’an enjoins a three-month period for it to be formalized. That is, for marriage, one utterance is enough, but for a divorce to be finalized, three utterances are required, between which a long gap has been prescribed by the shari‘ah. The purpose of this gap is to give the husband sufficient time to revise his decision, and to consult the well-wishers around him. It also allows time for relatives to intervene in the hopes of persuading both husband and wife to avoid a divorce. Without this gap, none of these things could be achieved. That is why divorce proceedings have to be spread out over a long period of time.

All these preventive measures clearly allow frayed tempers to cool, so that the divorce proceedings need not reach a stage that is irreversible. Divorce, after all, has no saving graces, particularly in respect of its consequences. It simply amounts to ridding oneself of one set of problems only to become embroiled in another set of problems.
Despite all such preventive measures, it does sometimes happen that a man acts in ignorance, or is rendered incapable of thinking coolly by a fit of anger. Then on a single occasion, in a burst of temper, he utters the word “divorce” three times in a row, “talaq, talaq, talaq!” Such incidents, which took place in the Prophet’s lifetime, still take place even today. Now the question arises as to how the would-be divorcer should be treated. Should his three utterances of talaq be treated as only one, and should he then be asked to extend his decision over a three-month period? Or should his three utterances of talaq on a single occasion be equated with the three utterances of talaq made separately over a three-month period? There is a Hadith recorded by Imam Abu Dawud and several other traditionists which can give us guidance in this matter: Rukana ibn Abu Yazid said “talaq” to his wife three times on a single occasion. Then he was extremely sad at the step he had taken. The Prophet asked him exactly how he had divorced her. He replied that he had said “talaq” to her three times in a row. The Prophet then observed, “All three count as only one. If you want, you may revoke it.” Fath al-Bari, 9/275

A man may say “talaq” to his wife three times in a row, in contravention of the shari‘ah’s prescribed method, thereby committing a sin, but if he was known to be in an emotionally overwrought state at the time his act may be considered a mere absurdity arising from human weakness. His three utterances of the word talaq may be taken as an expression of the intensity of his emotions and thus the equivalent of only one such utterance. He is likely to be told that, having transgressed a shari‘ah law, he must seek God’s forgiveness, must regard his three utterances as only one, and must take a full three months to arrive at his final decision.
In the first phase of Islam, however, a different view of divorce was taken by the second Caliph, ‘Umar ibn al-Khattab. An incident that illustrates his viewpoint was thus described by Imam Muslim.
In the Prophet’s lifetime, then under the Caliphate of Abu Bakr and also during the early period of the Caliphate of ‘Umar, three utterances of talaq on one occasion used to be taken together as only one utterance. Then it occurred to ‘Umar ibn al-Khattab that in spite of the fact that a system had been laid down which permitted the husband to withdraw his first, or even second talaq, men still wanted to rush into divorce. He felt that if they were bent on being hasty, why should not a rule be imposed on them binding them to a final divorce on the utterance of talaq three times in a row. And he proceeded to impose such a rule.

This act on the part of the second Caliph, apparently against the principles of the Qur’an and Sunnah, did not in any way change the law of the shari‘ah. To think that this led to any revision of Islamic law would be to misunderstand the situation: the Caliph’s order merely constituted an exception to the rule, and was, moreover, of a temporary nature. This aptly demonstrates how the Islamic shari‘ah may make concessions in accordance with circumstances.
Each law of the shari‘ah may be eternal, but a Muslim ruler has the power to make exceptions in the case of certain individuals in special sets of circumstances. However, such a ruling will not take on the aspect of an eternal law. It will be purely temporary in nature and duration.
It is a matter of Islamic historical record that when any such person was brought before ‘Umar for having uttered the word talaq three times on one occasion, he held this to be rebellious conduct and would order him to be flogged on the back. Fath al-Bari, 9/275
Perhaps the most important aspect of this matter is that when ‘Umar gave his exceptional verdict on divorce being final after the third utterance on a single occasion of the word talaq, his position was not that of a powerless ‘alim (scholar) but of a ruler invested with the full power to punish-as a preventive measure-anyone who went against Qur’anic injunctions. This was to discourage haste in divorce. By accepting a man’s three talaqs on the one occasion as final and irrevocable, he caused him to forfeit his right to revoke his initial decision, thus leaving him with no option but to proceed with the divorce.

On the other hand, the Caliph had it in his power to fully compensate any woman affected by this ruling. For instance, he was in a position to guarantee her an honorable life in society and if, due to being divorced, she was in need of financial assistance, he could provide her with continuing maintenance from the government exchequer, baitul mal, etc.
Today, anyone who cites ‘Umar’s ruling as a precedent in order to justify the finality of a divorce based on three utterances of the word talaq on a single occasion should remember that his verdict will remain. Unenforceable for the simple reason that he does not have the powers that ‘Umar, as Caliph, possessed. ‘Umar’s verdict was that of a powerful ruler of the time and not just that of a common man. It is necessary at this point to clear certain misunderstandings which have arisen about the extent of agreement which existed on ‘Umar’s ruling. Of all the Prophet’s Companions who were present at Medina at that time, perhaps the only one to disagree was ‘Ali. As a result of this, certain ‘ulama have come to the conclusion that the Prophet’s followers (Sahabah) had reached a consensus (‘ijma) on this matter. Rawai’ ai-Boyan, 1/334

But the consensus reached was not on the general issue of divorce, but on the right of Muslim rulers to make temporary and exceptional rulings, as had been done by ‘Umar. It is obvious that the Companions of the Prophet could never have agreed to annul a Qur’anic injunction or to modify for all time to come a prescribed system of divorce. All that was agreed upon was that exceptional circumstances warranted exceptional rulings on the part of the Caliph. He was entitled to punish in any manner he thought fitting, anyone who digressed from the shari‘ah. This right possessed by the ruler of the time is clearly established in the shari‘ah. Many other instances, not necessarily relating to personal disputes, can be cited of his exercise of this right.

The Meaning of Provision

In Islamic jurisprudence, the material arrangements that a man makes for his divorced spouse are termed “divorce provision.” There is a consensus among Muslim scholars that this provision in no way means life-long maintenance, there being absolutely no basis for this in the divine scriptures. The concept of maintenance for life is, in fact, a product of modem civilization. It was never at any time enshrined in divine laws, either in Islam, Judaism or Christianity. In material terms ‘provision’ simply takes the form of a gift handed over by the man on parting, so that the woman’s immediate needs may be catered for, and in all cases, this is quite commensurate with his means.

But the Qur’an makes it explicit that the parting must above all be humane and that justice must be done: “Provide for them with fairness; the rich man according to his means, and the poor according to his. This is binding on righteous men. Do not forget to show kindness to each other… reasonable provision should also be made for divorced women. That is incumbent on righteous men.” Qur’an, 2:236.

When divorce takes place before the settling of the dowry and the consummation of the marriage, even then the man must give the woman money or goods as a gesture of goodwill. In this instance the question of his repaying dowry money does not arise. The Qur’an is also quite explicit on this,
“Believers, if you marry believing women and divorce them before the marriage is consummated, you have no right to require them to observe a waiting period. Provide well for them and release them honorably.” – Qur’an, 33:49.
This “waiting period” (iddah) actually applies to a woman who has been married for some time and who may, subsequent to the divorce, discover that she is pregnant. This statutory waiting period of three months makes her position clear and then the man is required to pay her additional compensation if she is expecting his child. But again there is no question of maintenance for life, for the Qur’an seeks a natural solution to all human problems. It would, therefore, be wholly against the spirit of the Qur’an for a woman to be entitled to life maintenance from the very man with whom she could not co¬exist. Such a ruling would surely have created a negative mentality in society. The Qur’an again has the answer: “If they separate, God will compensate each of them out of His own abundance: He is Munificent, Wise.’’ – Qur’an, 4:130

The munificence of God refers to the vast provision that God has made for his servants in this world.
In various ways God helps such distressed people. For example, when a woman is divorced, it is but natural that the sympathy of all her blood relations should be aroused. And, as a result, without any pressure being put on them, they are willing to help and look after her. Besides, a new will power is awakened in such a woman and she sets about exploiting her hidden potentialities, thus solving her problems independently. Furthermore, previous experiences having left her wiser and more careful, she feels better equipped to enter into another marital relationship with more success.

After Divorce
The question that arises immediately after divorce is of ways and means to meet one’s necessary expenses. . One’s answer is to resort to the Islamic law of inheritance. If women were to be given their due share according to Islamic law, there would be no question of a woman becoming destitute. But, sad to say, the majority of Muslim women fail to get their due share of inheritance from their deceased fathers and husbands as stipulated by Islamic law. If they could do so, this would be more than enough to meet such emergencies.
However, Islam has not just left women’s financial problems to the vagaries of inheritance, because parents are not invariably in possession of property that can be divided among their children. Further arrangements have been made under the maintenance law, but this has no connection with the law of divorce. The answer to this question must be sought therefore in the Islamic law of maintenance. Here we shall briefly describe some of its aspects:

1. In case the divorced woman is childless or the children are not earning, according to Islamic law, the responsibility for her maintenance falls on her father. That is, her situation will be the same as it was before marriage.

To quote from Path al-Qadir (A standard book on Islamic Law):
The Father is responsible for bearing the expenses of his daughter till her marriage, in the event of her having no money. The father has no right to force her to earn, even if she is able to. When the girl is divorced and the period of confinement is over, her father shall again have to bear her expenses.
2. If the divorced woman has a son who is an earning member of the family, the responsibility for her maintenance falls entirely upon him.
All that rightfully belongs to a wife will be the duty of the son to provide, that is, food, drink, clothes, house and even servants, if possible. Ibn ‘Abidin, Ramal-Mukhtar ‘ala ad-Durr al-Mukhtar, 2/733

3. In the case of the father being deceased, and where even her children are unable to earn, her nearest relatives such as brothers or uncles are responsible for her upkeep. In the absence of even this third form, the Islamic shari‘ah holds the State Treasury (baitul mal) responsible for bearing her expenses. She will be entitled to receive the money for her necessities.
Because of the number of provisions made under Islamic law for women it has never been the case in Islamic history that Muslim divorced women have been cast adrift, helpless, with no one to look after them.
Indian columnist, Khushwant Singh has remarked that we do not hear of Muslim women committing suicide or being tortured like Hindu women, which is a proof that Islam has already given them adequate liberty and has- made enough provision for them to be supported in times of emergencies.
A new dimension has been added to the issue since the women of this day and age can leave their homes to work, and are therefore not as entirely dependent on men as they used to be in the past: there is no need then to make laws which provide for them at the expense of their men folk. When they are earning like men, what is the point in making such a law? Only in exceptional cases, surely, do they need to be looked after, and ways and means of doing so can generally be worked out quite satisfactorily on a personal level.

In Hindi

स्वभाव है कि पुरुषों और महिलाओं को अपने जीवन में एक साथ नेतृत्व की मांग। इस तरह के एक अग्रणी जीवन का आदर्श तरीका Shari’ah के अनुसार, है, शादी के बंधन के भीतर। इस्लाम में विवाह दोनों एक नागरिक अनुबंध दूल्हे और दुल्हन, और जो करने के लिए महान धार्मिक और सामाजिक महत्व दिया जाता है एक बेहद पवित्र बंधन की आपसी सहमति से में प्रवेश किया है।
हालांकि, ज्ञान है कि कानूनी बाधाओं की एक अतिरिक्त विद्रोह करने के लिए नेतृत्व कर सकते हैं, इस तरह के एक यथार्थवादी रोक न्यूनतम करने के लिए रखा गया है और सामान्य मानव क्षमताओं के साथ लगातार होने के लिए तैयार किया गया है। इसके अलावा, उनके प्रवर्तन कम व्यक्ति की धार्मिक कंडीशनिंग की तुलना पर भरोसा किया जाता है उच्च नैतिक मानकों और वैवाहिक मामलों और परिवार के जीवन में उचित आचरण के रखरखाव सुनिश्चित करने के लिए।
शादी के राज्य न केवल पारिवारिक जीवन के लिए नींव देता है, लेकिन व्यक्तियों समाज के लिए एक सकारात्मक समायोजन करने के लिए के लिए भी एक प्रशिक्षण जमीन प्रदान करता है। एक आदमी और औरत एक अच्छा पति और एक अच्छी पत्नी साबित करते हैं, वे निश्चित रूप से उनके सामाजिक समूह के व्यापक स्पेक्ट्रम में अच्छे नागरिक साबित होगा। यह जिसे उपयुक्त एक हदीस में व्यक्त किया गया है: “आप में से सबसे अच्छा एक है जो अपने परिवार के लिए सबसे अच्छा है।” इब्न Majah, Sunan, किताब एक-Nikah, 1/636
परिवार मनुष्य के प्रशिक्षण के लिए प्रारंभिक इकाई जा रहा है, इसका विघटन समाज उन मनुष्य को व्यक्तिगत रूप से एक सकारात्मक योगदान करना चाहिए जो करने के लिए, सामूहिक रूप से वे एक अच्छे और सिर्फ राष्ट्र के लिए फार्म कर रहे हैं पर एक हानिकारक प्रभाव पड़ता है। परिवार अब मौजूद नहीं है, तो यह मानवता, जो ग्रस्त है की पूरी है।
एक बार एक आदमी और एक औरत शादी के बंधन के बंधन में बंधे हैं, वे अपने अधिकतम करने के लिए दिन वे सम्मान और बनाए रखने के लिए क्या कुरान उनकी फर्म को ठेका, या प्रतिज्ञा कॉल करने के लिए मरने तक उम्मीद कर रहे हैं। (कुरान, 4:21) यह अंत करने, शरिया का पूरा जोर तलाक की घटना को रोकने पर लगाया जाता है; यह कानून इस संबंध में नीचे देता है मुख्य रूप से मौजूद है, इसलिए, चेक, न प्रोत्साहन के रूप में।
इस्लाम ही है कि शासन के लिए एक अपवाद के रूप में एक बहुत ही वांछनीय संस्था के रूप में शादी का संबंध है, इसलिए जीवन के शासन के रूप में शादी की अपनी अवधारणा है, और तलाक। एक हदीस के अनुसार, पैगंबर मुहम्मद ने कहा, “मेरी शादी सुन्नत (रास्ता) में से एक है। एक है जो पालन नहीं करता है यह मेरे लिए संबंधित नहीं है। “इब्न Majah, Sunan, किताब एक-Nikah।
एक मेल और एक औरत के पति और पत्नी के रूप में एक साथ रहते हैं, तो यह है, लेकिन स्वाभाविक है कि वे अपने मतभेद होना चाहिए यह एक जैविक और मनोवैज्ञानिक तथ्य यह जा रहा है कि हर आदमी और एक औरत इस दुनिया में पैदा उनके स्वभाव से प्रत्येक से काफी अलग हैं अन्य। यही कारण है कि इस दुनिया में एकता होने की एकमात्र विधि मतभेदों के बावजूद एकजुट होकर रहते है यही कारण है। यह केवल धैर्य और सहिष्णुता के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है; न केवल एक सामान्य अर्थों में पैगंबर द्वारा की वकालत गुण है, लेकिन अधिक महत्वपूर्ण बात, विवाहित जीवन के विशेष संदर्भ में। इन गुणों के बिना, वहाँ शादी के बंधन में कोई स्थिरता हो सकता है। अबू Hurayrah के अनुसार, पैगंबर ने कहा, “नहीं, विश्वास आदमी एक विश्वास औरत के खिलाफ कोई शिकायत सहन करना चाहिए। अगर उसके तरीकों में से एक ने अपनी पसंद के हिसाब से नहीं है, वहाँ कई चीजें हैं उसके बारे में है कि उसे खुश करने के लिए किया जाना चाहिए। “मुस्लिम, Sahih, किताब AR-Rada ‘, 2/1091
यह एक स्वीकृत तथ्य यह है कि हर किसी को अपनी ताकत और अपनी कमजोरियों, उसकी अधिक अंक और उसके शून्य अंक है। यह पति और पत्नी का भी उतना ही सच है। वैवाहिक स्थिति में, सर्वोत्तम नीति के लिए प्रत्येक साझेदार, अन्य के साथ साथ बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करने के लिए शून्य अंक की अनदेखी करते हुए है। एक पति और पत्नी इस कहावत का मूल्य देख सकते हैं और जानबूझकर उनके जीवन में मुख्य मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में इसे अपनाने, तो वे उनकी शादी स्थिर शेष का एक बहुत ही अच्छा मौका होगा।

हालांकि, यह कभी कभी के साथ या बिना कारण होता है, कि वैमनस्य फसलों, और पति और पत्नी के बीच बढ़ रही है, उनके खुद के द्वारा चीजों को सुचारू करने में सक्षम होने की कोई स्पष्ट संकेत के साथ चला जाता है। एक तरीका है कि उनकी अव्यवस्था से वातानुकूलित है में एक दूसरे के बारे में उनकी सोच उन्हें अपने मतभेदों, तथ्यों के बजाय राय के आधार पर की एक बस निपटान पर पहुंचने से रोकता है। ऐसे एक मामले में, कुरान के अनुसार सबसे अच्छी रणनीति एक तीसरी पार्टी है जो एक मध्यस्थ के रूप में कार्य करेगा परिचय है। विवाद के तहत मामलों के साथ किसी भी पिछले एसोसिएशन रहा है, वह निष्पक्ष रहना होगा और एक उद्देश्य दोनों पक्षों को स्वीकार्य निर्णय पर पहुंचने के लिए सक्षम हो जाएगा।

किसी भी मध्यस्थ सफल होने के लिए, तथापि, पति और पत्नी भी सही रवैया अपनाना चाहिए। यहाँ चार पवित्र ख़लीफ़ा की अवधि, जो इस बात समझाना होगा की एक घटना है।


‘अली इब्ने अबी तालिब चौथे खलीफा के रूप में राज्य करता रहा है, वैवाहिक जीवन में कलह की एक शादीशुदा जोड़े शिकायत एक समझौता अनुरोध करने के लिए उसके पास आया। उपर्युक्त कुरान के मार्गदर्शन के प्रकाश में ‘अली आदेश दिया है कि पैरोकार, पति के परिवार से एक और पत्नी के परिवार से एक है, के एक बोर्ड का गठन किया जाना है, जो परिस्थितियों में उचित पूछताछ करना और उसके बाद अपना फैसला देना चाहिए । इस फैसले को दोनों पक्षों द्वारा तर्क के बिना स्वीकार किया जाना था।


पुस्तक में दर्ज है, जामी ‘अल-बयान,-Tabari पर रखकर महिला ने कहा है कि वह अपनी सहमति दे दी है, भगवान की किताब पर, चाहे फैसले के लिए या उसके खिलाफ था। लेकिन आदमी ने विरोध किया है कि वह इस फैसले को स्वीकार नहीं करेगा अगर यह अलग होने के लिए गया था। ‘अली ने कहा, “क्या आप कहना अनुचित है। भगवान करके, आप यहां से स्थानांतरित नहीं कर सकते जब तक आप एक ही आत्मा में पैरोकार के फैसले को स्वीकार करने के लिए अपनी इच्छा के रूप में महिला को दिखाया गया है पता चला है। ”


इससे यह स्पष्ट है कि एक सच्चे विश्वास तहे दिल पैरोकार हैं और उनके फैसले को कुरान की रोक के अनुसार स्वीकार कर लेना चाहिए बनाता है। एक बार अपने फैसले में दिया जाता है, आगे कोई विवाद होना चाहिए।


“तलाक दे करने के दो तरीके”


हालांकि, यह स्वीकार किया है कि जीवन हमेशा सुचारू रूप से काम नहीं करता है, एक मशीन की तरह है। सभी सुरक्षा उपायों के बावजूद, यह कभी कभी होता है कि एक जोड़ी ऐसी हताशा है कि वे जुदाई पर आमादा हो जाते हैं की एक स्तर तक पहुँच करता है। यहां शरिया उन में यह अलग होने के लिए एक विशेष विधि का प्रावधान है कि मार्गदर्शन देता है। कुरान यह इस प्रकार व्यक्त करता है: “तलाक दो बार उच्चारित किया जा सकता है, तो एक औरत के सम्मान में बनाए रखा या दया के साथ जाने की अनुमति दी जानी चाहिए।” कुरान, 2: 229


यह कविता का मतलब है कि एक आदमी है जो दो बार दो महीने की अवधि में तलाक का नोटिस दिया गया है नोटिस तीसरी बार देने से पहले भगवान को याद रखना चाहिए व्याख्या की गई है। फिर वह या तो सद्भावना की भावना में उसके साथ उसके पति रखना चाहिए, या वह उसे किसी भी अन्याय कर रही बिना उसे रिहा कर देना चाहिए।

कुरान द्वारा निर्धारित है, यानी तीन महीने लेने इसे अंतिम रूप देने के लिए तलाक का यह तरीका है, यह असंभव एक आदमी तलाक की मांग अचानक उसकी पत्नी टालना करने के लिए बनाता है। एक बार जब वह (जो नहीं करना चाहिए इस समय मासिक धर्म हो) अपनी पत्नी से कहा है, “मैं तुम्हें तलाक,” दोनों एक पूरे महीने के लिए स्थिति पर सोचने के लिए उम्मीद कर रहे हैं। आदमी इस अवधि के दौरान राय का एक परिवर्तन किया है, वह अपने शब्दों को वापस लेने के कर सकते हैं। यदि नहीं, तो वह फिर से, कहते हैं, “मैं तुम्हें तलाक,” (फिर से अपनी पत्नी को “पवित्रता” के एक राज्य में होना चाहिए) और वे फिर से एक और महीने के लिए स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए। यहाँ तक कि इस स्तर पर, पति की कार्यवाही को रद्द करने के लिए अगर वह दिल का एक परिवर्तन पड़ा है अधिकार है। अगर, हालांकि, तीसरे महीने में वे कहते हैं, “मैं तुम्हें तलाक,” तलाक फाइनल हो जाता है और आदमी इसे रद्द करने का कोई अधिकार नहीं रहता। अब वह अच्छा होगा की भावना में अपनी पत्नी के साथ हिस्सा है, और उसे पूरा अधिकार देने के लिए बाध्य है।

तलाक के इस निर्धारित विधि सुनिश्चित किया गया है कि यह एक अच्छी तरह से माना जाता है, की योजना बनाई व्यवस्था है और न सिर्फ एक खरोंच कदम भावना का एक फिट में ले लिया है। जब हम याद है कि ज्यादातर मामलों में, तलाक गुस्से का परिणाम है, हमें पता है कि निर्धारित विधि तलाक पर एक जबरदस्त अंकुश लगाने देता है। यह तथ्य यह है कि क्रोध कभी नहीं रहता है लेता है – tempers जरूरी कुछ समय ¬and के बाद शांत है कि जो लोग गुस्से में अपनी पत्नियों को तलाक तरह लग रहा है निश्चित रूप से उनके भावनात्मक विस्फोट पश्चाताप करेंगे और स्थिति से वापस लेने की इच्छा होगी यह उन में डाल दिया है यह भी खाते में तथ्य यह है कि तलाक के एक नहीं एक साधारण मामला है लेता है। इसे घर के टूटने को और बच्चों के भविष्य को नष्ट करने के बराबर है। यह केवल जब गुस्सा ठंडा हो गया है कि तलाक के गंभीर परिणाम महसूस कर रहे हैं, और आवश्यकता निर्णय को रद्द करने के लिए स्पष्ट हो जाता है।


एक आदमी एक औरत से शादी कर लेता है, वह केवल एक बार है कि वह उसे अपने पति या पत्नी के रूप में स्वीकार करता है क्या कहना है। लेकिन तलाक के लिए, कुरान एक तीन महीने की अवधि में यह औपचारिक रूप दिया जा करने के लिए आदेश दिया। वह यह है कि शादी के लिए, एक उक्ति पर्याप्त है, लेकिन के लिए एक तलाक को अंतिम रूप दिया जा सकता है, तीन की कथनी आवश्यक हैं, जो बीच एक लंबे अंतराल के Shari’ah द्वारा निर्धारित किया गया है। इस अंतर के प्रयोजन के पति के लिए पर्याप्त समय देने के अपने फैसले को संशोधित करने के लिए, और उसके चारों ओर शुभचिंतकों से परामर्श करने के लिए है। यह भी रिश्तेदारों पति और पत्नी दोनों राजी तलाक से बचने के लिए की उम्मीद में हस्तक्षेप करने के लिए समय की अनुमति देता है। इस अंतर के बिना, इन बातों से कोई भी प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण है कि तलाक की कार्यवाही के समय की एक लंबी अवधि में बाहर फैल होने की जरूरत है।

इन सभी निवारक उपाय स्पष्ट रूप से की अनुमति अस्तव्यस्त tempers शांत करने के लिए, तो यह है कि तलाक कार्यवाही की जरूरत तक पहुँच नहीं एक मंच है कि अपरिवर्तनीय है. तलाक, सब के बाद, कोई बचत गौरव, विशेष रूप से के संबंध में अपने परिणाम. यह बस के बराबर है मुक्त अपने आप के एक समस्याओं का सेट केवल बनने के लिए में उलझे का एक और सेट समस्याएं हैं. के बावजूद ऐसे सभी निवारक उपाय, यह कभी कभी होता है कि एक आदमी कार्य करता है अज्ञानता में, या प्रदान की गई है के काबिल नहीं सोच ठंडे दिमाग द्वारा एक गुस्से. तो फिर पर एक भी अवसर, में एक फट गुस्सा, वह utters शब्द” तलाक” तीन बार एक पंक्ति में,” तलाक, तलाक, तलाक!” इस तरह की घटनाओं, जो में हुई पैगंबर के जीवन भर, अभी भी जगह ले आज भी. अब सवाल उठता है के रूप में कैसे के होने वाले divorcer व्यवहार किया जाना चाहिए. चाहिए अपने तीन बयान के तलाक इलाज किया जा के रूप में केवल एक है, और वह तो कहा जा विस्तार करने के लिए अपने निर्णय पर एक तीन महीने की अवधि? या चाहिए अपने तीन बयान के तलाक पर एक भी अवसर के बराबर हो के साथ तीन बयान के तलाक अलग से बना से अधिक एक तीन महीने की अवधि? वहाँ एक हदीस द्वारा दर्ज की इमाम अबू Dawud और कई अन्य traditionists जो हमें दे सकते हैं मार्गदर्शन के इस मामले में: Rukana इब्न अबू Yazid ने कहा” तलाक” करने के लिए अपनी पत्नी तीन बार पर एक भी अवसर. फिर वह था बहुत दुख की बात पर कदम लिया था वह. पैगंबर ने उस से पूछा बिल्कुल कैसे उस ने उसे तलाक. उस ने कहा कि वह ने कहा था” तलाक” उसे करने के लिए तीन बार एक पंक्ति में. पैगंबर तो मनाया,” सभी तीन के रूप में गिनती केवल एक. यदि आप चाहते हैं, आप रद्द कर सकती है.” फतह अल बारी, 9/ 275
एक आदमी एक पंक्ति में अपनी पत्नी से कह सकते हैं “तलाक” तीन बार, Shari’ah के निर्धारित विधि है, जिससे एक पाप के उल्लंघन में है, लेकिन अगर वह समय पर एक भावनात्मक रूप से अतिव्य्घ्र राज्य में जाना जाता था उसका कृत्य हो सकता है एक मात्र मूर्खता मानवीय कमजोरी से उत्पन्न होने वाली माना जाता है। शब्द तलाक के लिए अपने तीन की कथनी अपनी भावनाओं की तीव्रता की एक अभिव्यक्ति है और इस प्रकार केवल एक ऐसी उक्ति के बराबर के रूप में लिया जा सकता है। उन्होंने कहा, वह भगवान की माफी की तलाश करना चाहिए केवल एक के रूप में अपने तीन बयान के संबंध में करना चाहिए, और अपने अंतिम निर्णय पर पहुंचने के लिए एक पूर्ण तीन महीने का समय लग जाना चाहिए कहा जा सकता है कि, एक Shari’ah कानून का उल्लंघन होने की संभावना है।
इस्लाम के पहले चरण में, हालांकि, तलाक का एक अलग दृष्टिकोण दूसरे खलीफा, ‘उमर इब्न अल Khattab द्वारा लिया गया था। एक घटना है कि अपने दृष्टिकोण को दिखाता है इस प्रकार इमाम मुस्लिम द्वारा वर्णित किया गया था।
पैगंबर के जीवन में, तो अबू बकर के खलीफा के तहत और भी उमर की खिलाफत के प्रारंभिक काल के दौरान इस्तेमाल एक अवसर पर तलाक के तीन बयान एक साथ केवल एक ही कथन के रूप में लिया जा सकता है। तो फिर यह ‘उमर इब्न अल Khattab हुआ है कि तथ्य यह है कि एक प्रणाली नीचे रखा गया था के बावजूद जो पति अपनी पहली, या यहां तक ​​कि दूसरी तलाक को वापस लेने की अनुमति दे दी, पुरुषों अभी भी तलाक में जल्दबाजी करना चाहता था। उन्होंने महसूस किया कि अगर वे जल्दबाजी में किया जा रहा है पर तुला थे, क्यों एक नियम उन पर एक पंक्ति में तलाक की वाणी पर अंतिम तलाक के लिए उन्हें बंधन में तीन बार लागू नहीं किया जाना चाहिए। और वह इस तरह के एक नियम के लागू करने के लिए रवाना हुए।

जाहिरा तौर पर कुरान और सुन्नत के सिद्धांतों के खिलाफ दूसरे खलीफा की ओर से इस अधिनियम, किसी भी तरह से Shari’ah के कानून में परिवर्तन नहीं किया। खलीफा के आदेश केवल नियम का एक अपवाद गठित, और था, इसके अलावा, एक अस्थायी प्रकृति की: कि इस इस्लामी कानून के किसी भी संशोधन करने के लिए नेतृत्व की स्थिति गलत होगा लगता है कि करने के लिए। यह दर्शाता है कि कैसे जिसे उपयुक्त इस्लामी Shari’ah परिस्थितियों के अनुसार रियायतें कर सकते हैं।
Shari’ah के प्रत्येक कानून अनन्त हो सकता है, लेकिन एक मुस्लिम शासक परिस्थितियों के विशेष सेट में कुछ व्यक्तियों के मामले में अपवाद बनाने की शक्ति है। हालांकि, इस तरह के एक फैसले के एक शाश्वत कानून के पहलू पर नहीं लगेगा। यह प्रकृति और अवधि में विशुद्ध रूप से अस्थायी होगा।
यह इस्लामी ऐतिहासिक रिकार्ड की बात है कि जब इस तरह के किसी भी व्यक्ति को इस अवसर पर एक शब्द तलाक तीन बार बोला होने के लिए ‘उमर से पहले लाया गया था, वह इस आयोजित विद्रोही आचरण हो सकता है और उसे आदेश होगा पीठ पर कोड़े की जानी है। फतह अल-बाड़ी, 9/275
शायद इस बात का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जब अलीम (विद्वान) ‘उमर शब्द तलाक का एक भी अवसर पर तीसरे उक्ति के बाद अंतिम जा रहा है तलाक पर अपनी असाधारण फैसला दिया है, उसकी स्थिति एक शक्तिहीन नहीं था कि’ लेकिन एक का है पूरी शक्ति के साथ निवेश किया शासक को सज़ा-रूप में एक निवारक उपाय-, जो किसी को कुरान की रोक के खिलाफ चला गया। इस तलाक में जल्दबाजी को हतोत्साहित करने के लिए किया गया था। अंतिम और अटल के रूप में एक अवसर पर एक आदमी के तीन talaqs को स्वीकार करके, वह वजह से उसे अपने प्रारंभिक निर्णय को रद्द करने के लिए उसकी सही अर्थदंड करने के लिए, इस प्रकार उसे कोई विकल्प नहीं है, लेकिन तलाक के साथ आगे बढ़ने के साथ जा रहा।

दूसरी ओर, खलीफा अपनी शक्ति को पूरी तरह से किसी भी महिला के इस फैसले से प्रभावित क्षतिपूर्ति करने में था। उदाहरण के लिए, वह एक स्थिति है उसका समाज में और अगर एक सम्मानजनक जीवन की गारंटी करने के लिए, के कारण में था तलाक दे दिया जा रहा है, वह वित्तीय सहायता की जरूरत थी, वह उसे सरकारी खजाने से जारी रखरखाव, बैतूल मल, आदि के साथ प्रदान कर सकता है
आज, जो किसी के क्रम में एक तलाक के एक भी अवसर पर शब्द तलाक के तीन बयान के आधार पर अंतिम औचित्य साबित करने के लिए एक मिसाल के रूप में उमर के फैसले का हवाला देते याद रखना चाहिए कि उसके फैसले रहेगा। सरल कारण है कि वह अधिकार है कि उमर, खलीफा के रूप में नहीं है के लिए unenforceable, के पास थी। ‘उमर के फैसले के समय का एक शक्तिशाली शासक की है कि और सिर्फ एक आम आदमी की है कि नहीं था। यह कुछ गलतफहमी जो समझौते के लिए किस हद तक ‘उमर के फैसले पर अस्तित्व के बारे में पैदा हुई है स्पष्ट करने के लिए इस बिंदु पर आवश्यक है। सभी पैगंबर के साथियों जो उस समय मदीना में मौजूद थे, शायद केवल एक ही असहमत के लिए ‘अली था। इस का एक परिणाम के रूप में, कुछ इस बात पर ‘(इज्मा) उलेमा निष्कर्ष है कि पैगंबर के अनुयायियों (Sahabah) एक आम सहमति पर पहुंच गया था पर आ गए हैं’। Rawai ‘ऐ-Boyan, 1/334

लेकिन आम सहमति तक पहुँच तलाक के सामान्य मुद्दे पर नहीं था, लेकिन मुस्लिम शासकों के अधिकार पर अस्थायी और असाधारण फैसलों बनाने के लिए, के रूप में उमर द्वारा किया गया था। यह स्पष्ट है कि पैगंबर के साथियों एक कुरान निषेधाज्ञा रद्द करने के लिए या हर समय तलाक का एक निर्धारित प्रणाली आने के लिए संशोधित करने के लिए सहमत हो गए हैं कभी नहीं कर सकता है। सब है कि सहमति हुई थी पर था कि असाधारण परिस्थितियों खलीफा की ओर से असाधारण फैसलों आवश्यक हो गया। वह किसी भी तरीके से वह फिटिंग सोचा था, जो किसी को भी Shari’ah से digressed में दंडित करने का  हकदार था। समय के शासक के पास यह अधिकार स्पष्ट रूप से Shari’ah में स्थापित है। कई अन्य उदाहरण है, जरूरी व्यक्तिगत विवादों से संबंधित नहीं है, यह अधिकार के अपने अभ्यास का आह्वान किया जा सकता है।


प्रावधान का अर्थ”
इस्लामी न्यायशास्त्र में, सामग्री की व्यवस्था है कि एक आदमी ने अपने तलाक दे पति या पत्नी के लिए बनाता है “तलाक प्रावधान।” कहा जाता है मुस्लिम विद्वानों के बीच एक आम सहमति है कि कोई रास्ता नहीं में इस प्रावधान को जीवन भर के रखरखाव का मतलब है, इस के लिए बिल्कुल कोई आधार नहीं किया जा रहा है दिव्य शास्त्रों। जीवन के लिए रखरखाव की अवधारणा, मॉडम सभ्यता का एक उत्पाद वास्तव में है। यह या तो इस्लाम, यहूदी या ईसाई धर्म में किसी भी समय दिव्य कानूनों में निहित पर कभी नहीं था। माल ‘शब्द प्रावधान’ में बस एक उपहार बिदाई पर आदमी द्वारा सौंप दिया के रूप लेता है तो यह है कि औरत की तत्काल जरूरतों के लिए catered किया जा सकता है, और सभी मामलों में, यह अपने मतलब के साथ काफी अनुरूप है।
लेकिन कुरान में यह स्पष्ट है कि बिदाई से ऊपर के सभी मानवीय होना चाहिए और कहा कि न्याय किया जाना चाहिए बनाता है: “निष्पक्षता के साथ उनके लिए प्रदान करना; अपने मतलब के अनुसार अमीर आदमी है, और उसके लिए गरीब अनुसार। इस धर्मी पुरुषों पर बाध्यकारी है। एक दूसरे को … उचित प्रावधान करने के लिए दया दिखाने के लिए भी तलाकशुदा महिलाओं के लिए बनाया जाना चाहिए मत भूलना। यही कारण है कि धर्मी पुरुषों पर निर्भर है “कुरान, 2:। 236।

तलाक, दहेज के निपटाने और विवाह की समाप्ति से पहले जगह लेता है फिर भी आदमी सद्भावना के रूप में महिला को पैसे या माल देना चाहिए। इस उदाहरण में उसकी चुकाने दहेज पैसे का सवाल ही नहीं उठता। कुरान भी इस पर काफी स्पष्ट है,
“विश्वासियों, यदि आप विश्वास महिलाओं से शादी और उन्हें तलाक से पहले शादी consummated है, तो आप एक प्रतीक्षा अवधि का निरीक्षण करने के लिए उन्हें आवश्यकता के लिए कोई अधिकार नहीं है। उनके लिए अच्छी तरह से प्रदान करने और उन्हें ससम्मान रिहा। “- कुरान, 33:49।
यह “प्रतीक्षा अवधि” (iddah) वास्तव में एक औरत जो कुछ समय और कौन हो सकता है, तलाक के बाद, खोज कि वह गर्भवती है के लिए शादी कर दिया गया है करने के लिए लागू होता है। तीन महीने के इस वैधानिक प्रतीक्षा अवधि में उसकी स्थिति स्पष्ट करता है और फिर आदमी यदि वह अपने बच्चे की उम्मीद कर रहा है उसे अतिरिक्त मुआवजे का भुगतान करने के लिए आवश्यक है। लेकिन फिर वहाँ जीवन के लिए रखरखाव का कोई सवाल ही नहीं, कुरान मानव के सभी समस्याओं के लिए एक प्राकृतिक समाधान चाहता है के लिए है। यह इसलिए, एक औरत बहुत आदमी जिनके साथ वह co¬exist नहीं कर सकता से जीवन के रखरखाव के हकदार हो करने के लिए कुरान की भावना के खिलाफ पूरी तरह से होगा। इस तरह के एक शासक निश्चित रूप से समाज में एक नकारात्मक मानसिकता बनाया होगा। “यदि वे अलग, भगवान उसकी अपनी बहुतायत से बाहर उनमें से प्रत्येक को क्षतिपूर्ति करेगा: कुरान फिर जवाब है वह, उदार, समझदार है ” – कुरान, 4:। 13

भगवान की उदारता विशाल प्रावधान है कि भगवान इस दुनिया में अपने कर्मचारियों के लिए बनाया गया है को संदर्भित करता है।
विभिन्न तरीकों से भगवान ऐसे व्यथित लोगों को मदद मिलती। उदाहरण के लिए, जब एक औरत को तलाक दे दिया है, यह है, लेकिन स्वाभाविक है कि सब उसके रक्त संबंधों की सहानुभूति जगाया जाना चाहिए। और, एक परिणाम के रूप में, किसी भी दबाव उन पर डाला जा रहा बिना, वे मदद और उसके बाद देखने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा, एक नया इच्छा शक्ति एक ऐसी औरत में जागा है और वह उसे छिपा योग्यता का शोषण, इस प्रकार स्वतंत्र रूप से उसकी समस्याओं को हल करने के बारे में तय करता है। इसके अलावा, पिछले अनुभवों बेहतर और अधिक सफलता के साथ एक और वैवाहिक रिश्ते में प्रवेश करने के लिए सुसज्जित उसकी समझदार और अधिक सावधान छोड़ दिया है, उसे लगता है कर रही है।

“तलाक के बाद”


सवाल यह है कि तलाक के बाद तुरंत उठता तरीके का है और किसी के लिए आवश्यक खर्चों को पूरा करने के लिए इसका मतलब है। । वन के जवाब विरासत का इस्लामी कानून का सहारा है। महिलाओं को इस्लामी कानून के अनुसार उनका उचित हिस्सा दिए जाने के लिए गए थे, वहाँ एक महिला बेसहारा बनने का कोई सवाल ही नहीं होगा। लेकिन, कहने के लिए दुख की बात है, मुस्लिम महिलाओं के बहुमत के रूप में इस्लामी कानून द्वारा निर्धारित उनके दिवंगत पिता और पति से विरासत का उनका उचित हिस्सा मिल असफल। वे ऐसा कर सकता है, इस तरह के आपात स्थिति से मिलने के लिए पर्याप्त से अधिक हो जाएगा।


हालांकि, इस्लाम सिर्फ विरासत की अनियमितता के लिए महिलाओं की वित्तीय समस्याओं को नहीं छोड़ा गया है, क्योंकि माता-पिता की संपत्ति है कि उनके बच्चों के बीच बांटा जा सकता है के कब्जे में निरपवाद रूप से नहीं कर रहे हैं। इसके अलावा व्यवस्था रखरखाव कानून के तहत किया गया है, लेकिन इस तलाक के कानून के साथ कोई संबंध नहीं है। इस सवाल का जवाब रखरखाव के इस्लामी कानून में इसलिए मांग की जानी चाहिए। यहाँ हम संक्षेप में अपने पहलुओं में से कुछ का वर्णन होगा:

1. मामले में तलाकशुदा महिला निःसंतान है या बच्चों कमाई नहीं कर रहे हैं, इस्लामी कानून के अनुसार, उसके रखरखाव के लिए जिम्मेदारी उसके पिता पर पड़ता है। वह यह है कि उसकी स्थिति के रूप में ही यह शादी से पहले था होगा।

पथ अल कादिर (इस्लामी कानून पर एक मानक पुस्तक) से बोली:
पिता उसकी शादी होने तक अपनी बेटी का खर्च असर, उसके पैसे नहीं होने की स्थिति में के लिए जिम्मेदार है। पिता भले ही वह करने में सक्षम है, कमाने के लिए मजबूर करने का कोई अधिकार नहीं है। जब लड़की को तलाक दे दिया जाता है और कारावास की अवधि खत्म हो गया है, उसके पिता उसे फिर से खर्च वहन करना होगा।
2. तलाकशुदा महिला के एक बेटा है जो परिवार के एक कमाऊ सदस्य है, तो उसका रखरखाव के लिए जिम्मेदारी उस पर पूरी तरह से गिर जाता है।
सब है कि हक एक पत्नी के अंतर्गत आता है, वह यह है कि, भोजन, पेय, कपड़े, घर और यहां तक ​​कि कर्मचारियों, यदि संभव हो तो बेटे का कर्तव्य प्रदान करने के लिए किया जाएगा। इब्ने Abidin, Ramal-मुख्तार ‘अला विज्ञापन-Durr अल मुख्तार, 2/733



3. पिता के मामले में मृतक की जा रही है, और जहां भी अपने बच्चों को कमाने में असमर्थ हैं, ऐसे भाई या चाचा के रूप में उसके नजदीकी रिश्तेदारों उसका रखरखाव के लिए जिम्मेदार हैं। यहां तक ​​कि इस तीसरे प्रपत्र के अभाव में, इस्लामी Shari’ah राज्य खजाना (बैतूल मल) उसे खर्च के असर के लिए जिम्मेदार मानती है। वह अपनी आवश्यकताओं के लिए धन प्राप्त करने के हकदार होंगे।
महिलाओं के लिए इस्लामी कानून के तहत किए गए प्रावधानों की संख्या की वजह से यह इस्लामी इतिहास है कि मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं भटकते हुए डाली गई है, असहाय, उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं साथ में मामला कभी नहीं किया गया है।
भारतीय स्तंभकार, खुशवंत सिंह ने टिप्पणी की है कि हम मुस्लिम महिलाओं आत्महत्या या हिंदू महिलाओं की तरह अत्याचार किया जा रहा है, जो एक सबूत है कि इस्लाम पहले से ही उन्हें पर्याप्त स्वतंत्रता दे दी है और पर्याप्त प्रावधान किया has- है उनमें से कई बार में समर्थित होने के लिए के बारे में सुना नहीं है आपात स्थिति।
एक नया आयाम इस दिन और उम्र की महिलाओं के बाद से इस मुद्दे को जोड़ दिया गया है अपने घरों से काम करने के लिए छोड़ सकते हैं, और इसलिए के रूप में पूरी तरह से पुरुषों पर निर्भर नहीं के रूप में वे अतीत में होना करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं: वहाँ तो कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं है जो उनके पुरूषों की कीमत पर उनके लिए प्रदान करते हैं। जब वे पुरुषों की तरह कमा रहे हैं, इस तरह के एक कानून बनाने का क्या मतलब है? केवल असाधारण मामलों में, निश्चित रूप से, वे के बाद देखा जा करने की जरूरत है, और तरीके और ऐसा करने का मतलब है आम तौर पर एक व्यक्तिगत स्तर पर काफी संतोषजनक ढंग से बाहर काम किया जा सकता है।


The History Of Islam

  • In the seventh century, Muhammad claimed the angel Gabriel visited him. During these angelic visitations, which continued for about 23 years until Muhammad’s death, the angel purportedly revealed to Muhammad the words of Allah (the Arabic word for “God” used by Muslims). These dictated revelations compose the Qur’an, Islam’s holy book. Islam means “submission,” deriving from a root word that means “peace.” The word Muslim means “one who submits to Allah.”