रम​ज़ान के क्या मायने हैं ? रमज़ान के महीने में पड़ने वाले 29 या 30 रोज़े के मायने क्या केवल इंसान को भूखा और प्यासा रखना है ?

दरअसल यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्युँकि कुछ नास्तिक  “रमज़ान” के महीने में 45° तापमान पर इंसान को 15 घंटे 30 दिन भूखे प्यासे रहने को इंसानों पर अल्लाह का अत्याचार बता रहे हैं।

मुझे उम्मीद है कि वह खुद रोज़े नहीं रखते होंगे और अपने इस धार्मिक दायित्व को पूरा ना करने की मानसिक कुंठा को संतुष्ट करने के लिए यह ऐसे ऊल जुलूल तर्क और भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। खैर

आईए समझते हैं कि “रमज़ान के मायने” क्या हैं और रोज़ा दरअसल है क्या ?

क्या केवल भूखा प्यासा रहना ही रोज़ा है ?

नहीं , दरअसल केवल भूखा और प्यासा रहना “फाक़ा” अर्थात “व्यर्थ उपवास” करना मात्र है इससे अधिक कुछ नहीं। रोज़ा एक संपुर्णता को समेटे हुए शब्द है जिसको सभी को समझना बेहद आवश्यक है।

क़ुरआन कहता है कि दुनिया इंसान के लिए एक परीक्षा स्थल है। इंसान की ज़िन्दगी का उद्देश्य ईश्वर की इबादत (उपासना) है। (क़ुरआन, 51:56)

इबादत का अर्थ क्या है ? ईश्वर केन्द्रित जीवन (God-centred life) व्यतीत करना है , इबादत एक पार्ट-टाइम नहीं, बल्कि फुल टाइम अमल है , जो पैदाइश से लेकर मौत तक जारी रहता है।

यह अनिवार्य अर्थात रोज़े फर्ज़ हैं , जो केवल रमज़ान के महीने में रखे जाते हैं और यह हर व्यस्क मुसलमान के लिए अनिवार्य हैं।

क़ुरआन में कहा गया है—

अल-कुरान:- ‘‘ऐ ईमान लाने वालो! तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुम से पहले के लोगों पर किए गए थे, शायद कि तुम डर रखने वाले और परहेज़गार बन जाओ।’’ – (क़ुरआन, 2:183)

अल-कुरान :- रमज़ान का महीना जिसमें क़ुरआन उतारा गया लोगों के मार्गदर्शन के लिए, और मार्गदर्शन और सत्य-असत्य के अन्तर के प्रमाणों के साथ। अतः तुममें जो कोई इस महीने में मौजूद हो, उसे चाहिए कि उसके रोज़े रखे और जो बीमार हो या यात्रा में हो तो दूसरे दिनों से गिनती पूरी कर ले। ईश्वर तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, वह तुम्हारे साथ सख़्ती और कठिनाई नहीं चाहता और चाहता है कि तुम संख्या पूरी कर लो और जो सीधा मार्ग तुम्हें दिखाया गया है, उस पर ईश्वर की बड़ाई प्रकट करो और ताकि तुम कृतज्ञ बनो।’’ – (क़ुरआन, 2:185)

अब समझिए कि “रोज़ा” क्या है

रोज़ा भी एक इबादत है ।

रोज़े को अरबी भाषा में ‘‘सौम’’ कहते हैं। इसका अर्थ ‘‘रुकने और चुप रहने’’ हैं। क़ुरआन में इसे ‘‘सब्र’’ भी कहा गया है, जिसका अर्थ है ‘स्वयं पर नियंत्रण’ और स्थिरता व जमाव (Stability)।

इसका ख़ुलासा ज़ब्ते नफ़स, साबित क़दमी और इख़्लास है।

• ज़ब्ते नफस :- अर्थात शरीर की समस्त इंद्रियों पर नियंत्रण करना।

• साबित क़दमी :- अर्थात अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना।

• इख़्लास :- अर्थात ईमानदारी और निष्ठा

“ज़ब्ते नफस” सबसे महत्वपूर्ण है।

शरीर की समस्त इंद्रियों पर नियंत्रण “रोज़े” का एक महत्वपूर्ण अंश है।

इंद्रियाँ कैसे नियंत्रित होंगी ?

जैसे रोज़ा रहने वाले के मन में कोई भी गलत , अनैतिक , ऐय्याशी , छद्म , झूठ , मक्कारी , चुगली , लड़ाई लड़ाना , दूषित अथवा किसी को भी बिना किसी उचित कारण के आर्थिक , सामाजिक और शारीरिक चोट पहुँचाने का ध्यान भी आया तो उसे तुरंत मन से ही निकाल देना या ऐसे विचार आने ही ना देना दरअसल “रोज़ा” है।

किसी महिला के प्रति गलत भाव आया या उसे देख कर या सोचकर मन और शरीर में उत्तेजना या बुरे ख्याल आए उसे तुरंत रोक देना ही नहीं बल्कि किसी भी महिला को इस नजर से देखने से खुद को रोकना ही दरअसल “रोज़ा” है।

चोरी , डकैती , धोखा देना या किसी को बेवजह कष्ट पहुँचाना और कष्ट पहुँचाने का सोचने को खुद को रोक देना या ऐसे ही वह तमाम बुरे काम जो मनमस्तिष्क में आते हैं उनको आने से रोकना ही दरअसल “रोज़ा” है।

चोरी , डकैती , धोखा देना या किसी को बेवजह कष्ट पहुँचाना और कष्ट पहुँचाने का सोचने को खुद को रोक देना या ऐसे ही वह तमाम बुरे काम जो मनमस्तिष्क में आते हैं उनको आने से रोकना ही दरअसल “रोज़ा” है।

सोचिएगा कि इन कामों को करना फिर कितना बुरा होगा कितना बड़ा प्रतिबंध होगा जबकि इनके सोचने पर ही रोज़े में प्रतिबंध है।

रोज़ा दरअसल पेट और मुँह के साथ साथ कान , आँख , और वाणी के साथ साथ हृदय और मन में भी गलत बात ना आए उसका एक प्रयास है तो अपनी शारीरिक इच्छाओं को नियंत्रित करना भी रोज़ा है। जिसका जितना अधिक प्रयास सफल होगा रोज़ा उतना अधिक सफल होगा।

“साबित क़दम” से तात्पर्य यह है कि इस्लाम और कुरान के बताए सभी आदर्शों पर अडिग होकर अमल करना और खुद के अन्दर की बुराइयों से जद्दोजहद करना ही दरअसल जेहाद है , और रमजान महीने में यह जेहाद करना ही दरअसल “रोज़ा” है।

“इख़्लास” अर्थात ईमानदारी और निष्ठा जो कि इस्लाम कामूलभूत सिद्धांत है , इसपर अडिग होकर अमल करना ही दरअसल रोज़ा है।

बात समझिए कि सिर्फ़ भूखा प्यासा रहना ही रोज़ा नहीं है। रोज़ा की संपुर्णता में उपरोक्त तीनों का ईमानदारी और निष्ठा से अमल करना आवश्यक है , रोज़े की संपुर्णता तभी होगी।

इस से ज़ाहिर होता है कि इस्लाम धर्म के समीप “रोज़ा” का मतलब यह है कि आदमी अपनी इंद्रियों के हवा व हवस और नाजायज़ इच्छाओं में बहक कर ग़लत राह पर ना पड़े और अपने अन्दर मौजूद ज़ब्त और साबित क़दमी के तेवर को बर्बाद होने से बचाऐ।

दिन प्रतिदिन के जो कार्य होते हैं उनमें तीन विषय ऐसे होते हैं, जो इन्सान की पाक आदतों को बर्बाद कर के उसे “हवा व हवस” का पुजारी बना देती है।

अर्थात खाना, पीना और औरत मर्द (पति-पत्नी) के बीच शारीरिक सम्बंध। इन्हीं को काबू में रखने और एक तय समय में उन से दूर रहने का दरअसल नाम भी “रोज़ा” है।

इस्लाम में मुसलमान का अल्लाह की इबादत की नीयत से सुर्योदय से लेकर सुर्यास्त तक अपने आप को जानबूझकर खाने, पीने और पत्नी-पत्नी का शारीरिक संबंध से खुद को बचाए रखने का दरअसल नाम भी “रोज़ा” है।

औरतों को मासिक धर्म और प्रसव के समय में रोज़ा ना रखने की छूट है।

शेष , नमाज़ , ज़कात इत्यादि तो फर्ज़ हैं ही जो रमज़ान के महीने में संपुर्ण करने की कोशिशें की जाती हैं।

सोचिएगा कि 30 दिन ऐसा जीवन व्यतीत करके कोई कितना नेक और पवित्र हो सकता है , सोचिएगा कि खुद के अन्दर की बुराइयों से 30 दिन लड़कर कोई 31 वें दिन वह इसी स्वभाव में रहना चाहेगा ? कुछ लोगों को बिगड़ते बिगड़ते कुछ दिन तो लगेंगे ही और कुछ लोग यही जीवन अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके आगे भी जीते रहेंगे और कुछ लोग यदि डगमगाए तो 11 महीने बाद फिर से रमज़ान उनको सुधारने के लिए आ जाएगा।

कुल मिलाकर एक वाक्य में रमजान किसी व्यक्ति के संस्कार और व्यवहार को उच्च स्तर पर ले जाने का एक महीना है , कुरान की यह वह व्यवस्था है जो बड़े से बड़े धनाढ्य और शहंशाह तथा बादशाहों को गरीब भूखे प्यासे की गरीबी उनकी भूख उनकी प्यास साल के हर महीने में महसूस करने को मजबूर करती है।

सोचो कि 45-50° के तापमान की भूख प्यास हो , बरसात हो या माईनस ज़ीरो डिग्री में गरीबों का भूखा प्यासा रहना , क्या बीतती है उनपर यह खुद महसूस करो , क्युँकि खुद महसूस करोगे तो उनके दर्द और तकलीफ का एहसास होगा , तो उनपर ज़कात निकाल कर खर्च करोगे।

छद्म नास्तिकों को यह समझ में नहीं आएगा।सभी लोगों से गुजारिश है

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#अन_छुए_पहलु

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Ramadan

​Ninth month of the Islamic Calendar.

Meaning:

Derived from “RAMADHA”, literally means “intense heat”.  The possible reasons for this meaning:

1. When the Islamic months were enforced the month of fasting coincided with the summer months of intense heat.

2. The second reason which has been mentioned is that due to fasting the temperature within the stomach increases, again the element of heat is a factor behind the actual naming of RAMADAN.

3. It has also been said that “RAMADHAA” is one of the names of Allah Ta’aalaa.  If that is the case then the month has acquired the name due to the fact that Allah Ta’aalaa burns away accumulated sins and eliminates then from the list of unlawful deeds.  Once again the burning sins cannonades “HEAT”.  However. it should be acknowledged that this reasoning is not wholly reliable.

Blessings:

Hadhrat Salmaan (R.A) reports that on the last day of Sha’baan the Messenger of Allah Ta’aalaa addressed then and said, “Oh people, there comes before you now a great month, a most blessed month in which lies a night more greater in virtue than 1,000 months; (LAYLATUL-QADR).  It is a month in which each day should be observed by fasting, this has been made obligatory by the Almighty Allah.”

Events:

1. Hadhrat Hasan (R.A.), Holy Prophet grandson was born on 15th of Ramadan, three years after Hijrah.

2. Qur’an was revealed on the 27th night of Ramadan from the “Lauhe Mahfooz” (on 7th heaven) to 1st heaven.

3. The first Battle in the Islamic History, “BATTLE OF BADR” took place on the 12th of Ramadan in year 2 A.H.

4. Victory of Makkah took place on 18th of Ramadan in the year 8 A.H.

5. Hadhrat Sawdah (R.A) was married in year 10 A.H. to the Holy Prophet 

6. Hadhrat Zainab Bint Khuzaima’s (R.A.) marriage took place in the year 3 A.H. to the Holy Prophet .

7. Deaths:

i)  Hadhrat Ruqayyah (R.A),  Holy Prophet  daughter, passed away at the young age of 23 in the year 2 A.H when the Prophet  was at “Battle of Badr”.

ii)  Hadhrat Khadijah (R.A), wife of the Holy prophet   departed from this world on the 11th of Ramadan in the year 10 A.H.

iii)  Hadrat Fatimah (R.A) took leave from the world on a Tuesday 3rd Ramadan in the year 11 A.H. (6 months after the death of Holy Prophet  she was only 29 years old.)

iv)  Hadrat Abbas (R.A.) the Holy Prophet  uncle passed away on a Friday  12th Ramadan in the year 32 A.H at the age of 88

v)  Hadrat Ali (R.A.) the Prophet  son-in-law departed from this world on Friday 27th Ramadan, age 57 in the year 40 A.H.

vi)  Hadhrat Saffiyah (R.A.) took leave from this world in the year 50 A.H., aged 60 years.

vii) Hadhrat Aa’ishah (R.A.) was 65 years old when she departed in the year 58 A.H.

रोज़ा

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सिर्फ भूखे प्यासे रहना ही रोज़ा नही है रोज़ा पुरे शरीर का होता है

आँख,कान नाक,हाथ पैर और सबसे बड़ा #नफ्ज़ पे काबू पाना यानि इच्छाओ पे काबू पाना

भूखे प्यासे रह कर उन ग़रीब इंसानो का दर्द महसूस होता है जिन्हें दो वक़्त की रोटी नसीब नही
जब आप मुकम्मल रोज़ा रखते है तो आपसे एक भी #गुनाह गलत काम नही होंगें

आपके अपने घर में भले ही पकवान भरे हो कोई देखने टोकने वाला भी नही फिर भी आप उसे नही खाते तो आप #नफ़्स में काबू रखना सीख जाते है
जब आप एक महीने लगातार नफ्ज़ में काबू पाने का प्रयत्न करते है तो आप काफ़ी हद तक कामयाब होते है और चोरी,ज़िनाकारी बलात्कार, बेईमानी आदि तरह की बुराई से बच जाते है,तमाम मुस्लिम रोज़े के बाद भी इसी दिन चर्या में जीते है

और रोज़े का यही मक़सद है